राजभाषा के लिए हिन्दी की दक्षिण में पैठ जरूरी
हर साल 14 सितंबर को ‘हिन्दी दिवस’ मनाया जाता है। पूर्व मंत्री शतरुद्र प्रकाश के अनुसार, देश में आज भी अंग्रेजी व्यावासिक भाषा बनी हुई है। उन्होंने बताया कि जब तक दक्षिण भारत के राज्य हिन्दी को स्वीकार नहीं करते, हिन्दी का राजभाषा बनना संभव नहीं है।

वाराणसी, हिटी। देश में हर साल 14 सितंबर को ‘हिन्दी दिवस’ मनाया जाता है। इसके बाद हिन्दी के झंडाबरदार ही भाषा को भूलकर अंग्रेजी में कामकाज निपटाने में जुट जाते हैं। दरअसल, आजादी के इतने साल बाद भी हम भाषाई बाधाओं से उबरकर हिन्दी को इसलिए प्रतिस्थापित नहीं कर सके, क्योंकि दक्षिण भारत के राज्यों में इसकी पैठ नहीं है। यह कहना है प्रदेश के पूर्व मंत्री शतरुद्र प्रकाश का।
कानूनी प्रावधान
उन्होंने कहा कि सत्य यही है कि ब्रिटिश इंडिया से लेकर भारत संघ बनने के बाद आज तक अंग्रेजी ही कामकाज की आधिकारिक भाषा बनी हुई है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में हिन्दी को अगर-मगर के साथ भारत संघ की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया। 343 (2) में लिखा गया है कि खंड-1 के प्रावधान के होते हुए भी संविधान लागू होने के 15 वर्ष की अवधि तक शासकीय प्रयोजनों में अंग्रेजी का इस्तेमाल होता रहेगा। 15 साल बीत जाने के बाद भी आजतक व्यवस्था वही चल रही है।
युवाओं की भाषा
शतरुद्र ने कहा कि आज हम अपने युवाओं को अंग्रेजी में ‘जेन-जी’ और ‘जेन-अल्फा’ बुलाने लगे हैं। सरकारी योजनाओं के नाम स्टार्टअप, स्टैंडअप, स्किल डेवलपमेंट हैं। नगर निगमों में भी प्राय: अंग्रेजी भाषा में ही विभिन्न करों और योजनाओं के नाम हैं। गांवों के बच्चे भी अब टाई लगाकर मम्मी-पापा ही बोलते हैं। तमाम आईएएस और आईपीएस भी अंग्रेजी में ही हस्ताक्षर करते हैं।
दक्षिण भारत की भूमिका
शतरुद्र ने कहा कि जबतक दक्षिण भारत के तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल, तेलंगाना जैसे राज्य हिन्दी को आत्मसात नहीं करेंगे, इसका राजभाषा बनना संभव नहीं हो सकेगा।


