हत्या के 29 साल पुराने मामले में पलटा फैसला, उम्र कैद रद्द, अभियुक्त बरी
लखनऊ की हाईकोर्ट ने 29 साल पुराने हत्या के मामले में अभियुक्त सांभर चाई को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को सिद्ध करने में असफल रहा, क्योंकि सभी साक्ष्य केवल परिस्थितिजन्य थे। मामले में कोई विश्वसनीय गवाह या प्रमाण नहीं थे, जिससे अभियुक्त पर आरोप साबित हो सके।

हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने लगभग 29 साल पुराने हत्या के एक मामले में ट्रायल कोर्ट से निर्णीत दोषसिद्धि को निरस्त करते हुए, अभियुक्त को बरी कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था, लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसी परिस्थितियों की पूरी और विश्वसनीय कड़ी स्थापित नहीं कर सका, जिससे अभियुक्त का अपराध संदेह से परे साबित हो सके। यह निर्णय न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान व न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की खंडपीठ ने सांभर चाई की अपील स्वीकार करते हुए, सुनाया है। मामला बहराइच के हुजूरपुर थाने में वर्ष 1997 में दर्ज मुकदमे का है।
अभियोजन के अनुसार रामबहोर नामक व्यक्ति 20 फरवरी 1997 को लापता हुआ था। आरोप था कि सांभर चाई समेत अन्य अभियुक्तों ने उसकी गला दबाकर हत्या कर दी और शव को नदी किनारे रेत में दफना दिया। लगभग एक माह बाद 19 मार्च को एफआईआर दर्ज हुई और अगले दिन शव बरामद किया गया। पोस्टमार्टम में मौत गला दबाने से होना बताया गया था। विचारण अदालत ने सांभर चाई को हत्या और साक्ष्य मिटाने के आरोप में उम्रकैद तथा अन्य सजा सुनाई थी। हालांकि अन्य अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया था। सांभर चाई ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर विचारण अदालत के फैसले को चुनौती दी।हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन का प्रमुख आधार एक गवाह के समक्ष अभियुक्त द्वारा की गई जुर्म की स्वीकारोक्ति थी। न्यायालय ने कहा कि जिस गवाह बुद्धिसागर ने जुर्म स्वीकारोक्ति की पुष्टि की थी वह स्वयं वादी का बहनोई था। न्यायालय ने कहा कि अभियुक्त और इस गवाह के बीच ऐसा कोई संबंध या विश्वास का आधार सामने नहीं आया, जिससे करीब एक माह बाद अभियुक्त द्वारा उसके सामने अपराध स्वीकार करने की बात विश्वसनीय लगे। कोर्ट ने शव की बरामदगी को लेकर भी अभियोजन के साक्ष्य पर सवाल उठाया। शव बरामद करने का कोई विधिवत बरामदगी मेमो प्रस्तुत नहीं किया गया और विवेचक भी अदालत में गवाही देने नहीं आया। पुलिस के दस्तावेज एक हेड कांस्टेबल के माध्यम से द्वितीयक साक्ष्य के रूप में साबित कराए गए। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कथित स्वीकारोक्ति और बरामदगी दोनों विश्वसनीय से साबित नहीं हुए। हत्या का कोई स्पष्ट उद्देश्य भी स्थापित नहीं किया गया।


