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जन्मदिन विशेष: मखमली शब्दों से गीत बुनने वाला गीतकार

gulzar

शब्द किसी भी गाने के जान होते हैं। इसके बाद गायक की आवाज और संगीतकार की कला अहम भूमिका अदा करती है। गीत बेहद खूबसूरत ढंग से लिखा गया हो, उसमें मखमली शब्दों का इस्तेमाल किया गया हो, तो वह खुद-ब-खुद श्रोता के दिल में उतर जाता है। इस तरह गीत लिखना किसी भी गीतकार के लिए आसान नहीं होता। मगर एक गीतकार है जो कई तरह की विषम परिस्थितियों का सामना करने के बावजूद वर्षों से लगातार दमदार गाने लिख रहा है। हम बात कर रहे हैं गुलजार की। आज (18 अगस्त) गुलजार का जन्मदिन है...

गुलजार का जन्म पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब के दीना में हुआ। गुलजार ने विभाजन की त्रासदी का सामना किया और पिछले 7 दशकों में कई बार अपने आसपास विचित्र सामाजिक परिस्थितियों को देखा। उन्होंने कई तरह की मुश्किलों का सामना किया। लेकिन इसके बावजूद वो अपना काम पूरे मन से कर रहे हैं। वो इतना खूबसूरत लिखते हैं कि उनके लिखे के आगे कोई गुलाब का फूल भी फीक लगने लगे। 

गुलजार गीतकार से पहले एक शायर हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि शायरी उनका पहला प्यार है। उन्होंने जब अपने करियर का पहला फ़िल्मी गीत 'मोरा गोरा अंग लई ले' लिखा तब वो फ़िल्मों के लिए गाने लिखने को लेकर ज़्यादा उत्सुक नहीं थे। हालांकि इसके बावजूद उन्हें गाने लिखने का मौका मिलता रहा और वो गाने लिखते चले गए।

गुलजार ने कई बड़ी हस्तियों के साथ काम किया। इन्हीं में से एक लता मंगेशकर हैं। लता जी और गुलजार से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा है। लता जी ने एक इंटरव्यू में बताया कि म्युजिक डायरेक्टर एसडी बर्मन के साथ उनका झगड़ा चल रहा था। इस बीच एक दिन उनका फ़ोन आया कि एक नया लड़का आया है उसने फ़िल्म 'बंदिनी' के लिए ये गाना लिखा है 'मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे'। मुझे ये गाना इतना पसंद आया कि मैं गाने के लिए मान गई।" इस तरह गुलजार की वजह से लता और बर्मन दा के बीच फिर से बातचीत शुरू हो गई। 

गुलजार का शुरुआती जीवन मुश्किलों से भरा रहा। उनका जन्म 18 अगस्त 1934 को पंजाब के दीना में हुआ। इस समय भारत का विभाजन नहीं हुआ था। लेकिन विभाजन के बाद वो भारत आ गए और गुलजार ने मुंबई का दामन थाम लिया। यहां उन्होंने कई तरह के काम किए। लेकिन इसके बाद उन्हें एक सही मंजिल मिली। 

गुलजार को 2002 में साहित्य अकादमी, 2004 में पद्म भूषण और 2008 में आई 'स्लमडॉग मिलेनियर' के गाने 'जय हो' के लिए ग्रैमी अवॉर्ड मिला। गुलज़ार साहब गानों के अलावा, आशीर्वाद (1968), खामोशी (1969), सफर (1970) , घरोंदा , खट्टा-मीठा (1977) और मासूम (1982) जैसी फ़िल्मों की पटकथा भी लिख चुके है। 

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