एफसीआरए विधेयक जेपीसी को भेजे जाने की संभावना
एफसीआरए विधेयक जेपीसी को भेजे जाने की संभावना-------------------------------विपक्ष के व्यापक विरोध के बीच सरकार ने दिए संकेत-बुधवार को लोकसभा में आ सकता है प्रस्ताव...

एफसीआरए विधेयक जेपीसी को भेजे जाने की संभावना------------------------------ -विपक्ष के व्यापक विरोध के बीच सरकार ने दिए संकेत
-बुधवार को लोकसभा में आ सकता है प्रस्ताव
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नईदिल्ली। विशेष संवाददाता
विदेशी अंशदान विनयमन अधिनियम (एफसीआरए) विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजे जाने की तैयारी है। बीते सत्र में पेश इस विधेयक पर विपक्ष के साथ सरकार की सहमति नहीं बन सकी है। सरकार भी इस विधेयक के सामाजिक व राजनीतिक पहलुओं को देखते हुए इसे पारित कराने पर जोर देने के बजाए व्यापक सहमति चाहती है। इसके अलावा वह इससे जुड़े विभिन्न पक्षों को भी साधने की कोशिश में जुटी है।
संसद के मानसून सत्र
संसद के मानसून सत्र के अब केवल दो दिन बचे हैं। आखरी दिन वैसे भी कोई खास कामकाज नहीं होता है ऐसे में प्रभावी रूप से एक ही दिन है। सरकार ने हंगामे के बीच अपने कई विधेयकों को पारित भी कराया है, लेकिन पिछले सत्र में पेश किए गए एफसीआरए विधेयक को लेकर कोई फैसला नहीं किया गया है। हालांकि सरकार ने इस पर अंदरूनी तौर पर विपक्षी दलों से बात की है, लेकिन खुलकर न तो उसे सूचीबद्ध किया गया और न ही उस पर बीएसी में चर्चा की गई है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
सूत्रों के अनुसार मंगलवार को राज्यसभा की कार्य मंत्रणा समिति की बैठक के दौरान कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस उन पार्टियों में शामिल थीं जिन्होंने यह मुद्दा उठाया, हालांकि यह एजेंडा का हिस्सा नहीं था। इन दलों ने सवाल किया कि एफसीआरए विधेयक को सदन में कब लाया जाएगा। इसके जवाब में सरकार ने कहा कि इस बारे में उचित समय पर निर्णय लिया जाएगा। इन दोनों पार्टियों ने विधेयक को वापस लेने की मांग की, लेकिन बीजद जैसे अन्य दलों का मानना है कि विधेयक को व्यापक चर्चा के लिए संसद की संयुक्त समिति के पास भेजा जा सकता है। द्रमुक, माकपा व राकांपा (शप) का रुख वापस लेने या फिर जेपीसी को भेजने का रहा।
एफसीआरए विधेयक पर आपत्ति जताने वाले विपक्षी दलों का आरोप है कि यह अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है क्योंकि इसके कुछ प्रावधान ईसाई एनजीओ और अल्पसंख्यक-संचालित सामाजिक कल्याण व शैक्षणिक संस्थानों के लिए वैध वित्तपोषण को बाधित कर देंगे। हालांकि सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म से जुड़ा नहीं है और इसका उद्देश्य विदेशी अंशदान को विनियमित करना है।
ईसाई समुदाय का एतराज
ऐसे में विपक्ष की व्यापक असहमति को देखते हुए सरकार ने सत्र के आखिर में इसे जेपीसी को भेजने का मन बना लिया है। सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि विधेयक को जेपीसी को भेजा जाएगा। सूत्रों के अनुसार बुधवार को सरकार लोकसभा में विधेयक को जेपीसी को भेजने का प्रस्ताव ला सकती है। विधेयक को जेपीसी को भेजने की एक वजह इससे जुड़े पक्षों का विरोध भी रहा है। हाल में ईसाई समुदाय के कई प्रतिनिधियों व पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ नेताओं ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। तब भी गृह मंत्री ने उनकी शंकाओं को दूर करने की कोशिश की थी। मिजोरम के मुख्यमंत्री ने कहा था कि 12 अगस्त को विधेयक लाया जाएगा। लेकिन अब 12 अगस्त को इसे जेपीसी को भेजे जाने की संभावना है।
सरकार का रुख
सत्र के आखिर में सरकार विपक्ष के पाले में डाली गेंद
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गौरतलब है कि संसद का मानसूम सत्र में पहले ही दिन यानी 20 जुलाई से ही विपक्ष के तेवर तीखे रहे हैं और उसने हर दिन हंगामा और नारेबाजी कर लोकसभा को तो बुरी तरह बाधित किया ही है, राज्यसभा में भी सरकार से टकराव जारी रखा है। सत्र में अधिकांश समय विपक्ष की मांगो को मानने से दूरी बनाती रही सरकार आखरी दिनों में नरम दिखी और उसने विपक्ष की मांगो को मानना भी शुरू किया। सरकार ने जंतर मंतर की घटना पर चर्चा और गृह मंत्री के जबाब देने की मांग मान ली। लेकिन विपक्ष पहले गृह मंत्री के बयान की मांग पर अड़ा है। इसके अलावा सरकार ने एफसीआरए विधेयक पर भी विपक्ष के विरोध का सम्मान करते हुए इसे जेपीसी को भेजने की उसकी मांग मान ली है। सरकार के इस रुख से साफ है कि वह संसद सत्र न चल पाने के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश कर रही है और कह रही है कि सरकार ने विपक्ष की सभी मांगे मान ली फिर भी वह सदन को न तो चलाने के लिए और न ही चर्चा के लिए तैयार हुआ।
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