Girish Karnad veteran actor and playwright and Jnanpith awardee dies - अभिनेता गिरीश कर्नाड का निधन, राष्ट्रपति, PM मोदी ने जताया शोक DA Image

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अभिनेता गिरीश कर्नाड का निधन, राष्ट्रपति, PM मोदी ने जताया शोक

मशहूर अभिनेता गिरीश कर्नाड का लंबी बीमारी के बाद सोमवार सुबह निधन हो गया। वह ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित थे। अभिनेता के अलावा गिरीश कर्नाड लेखक और निर्देशक भी थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, गिरीश कर्नाड का निधन उनके बेंगलुरु स्थित घर पर हुआ।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रख्यात नाटककार और अभिनेता गिरीश कर्नाड के निधन पर सोमवार को शोक जताते हुए कहा कि आने वाले वर्षों में उन्हें उनके काम के लिए हमेशा याद किया जाएगा। कोविंद ने कहा कि कर्नाड के निधन से भारत का सांस्कृतिक जगत सूना हो गया है। कोविंद ने ट्वीट किया, 'लेखक, अभिनेता और भारतीय रंगमंच के सशक्त हस्ताक्षर गिरीश कर्नाड के देहावसान के बारे में जानकार दुख हुआ है। उनके जाने से हमारे सांस्कृतिक जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। उनके परिजनों और उनकी कला के अनगिनत प्रशंसकों के प्रति मेरी शोक संवेदनाएं।'

पीएम मोदी ने कहा कि कर्नाड को सभी माध्यमों में उनके बहुमुखी अभिनय के लिए याद किया जाएगा। उन्होंने टि्वटर पर कहा, 'वह उन मुद्दों पर भी भावुकता से बोलते थे जो उन्हें प्रिय लगते थे। आने वाले सालों में उनका काम की लोकप्रियता बनी रहेगी। उनके निधन से दुखी हूं।' 

बता दें कि गिरीश कार्नाड का जन्म 19 मई, 1938 को माथेरान, महाराष्ट्र में हुआ था। वे भारत के जाने माने लेखक, अभिनेता, फ़िल्म निर्देशक और नाटककार थे। कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा दोनों के ही जानकार थे। गिरीश कर्नाड को 1998 में ज्ञानपीठ सहित पद्मश्री व पद्मभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। कार्नाड द्वारा रचित तुगलक, हयवदन, तलेदंड, नागमंडल व ययाति जैसे नाटक काफी लोकप्रिय हुये और भारत की अनेकों भाषाओं में इनका अनुवाद व मंचन हुआ है।

गिरीश कर्नाटक आर्ट कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड जाकर आगे की पढ़ाई पूरी की और फिर भारत लौट आए। चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में सात साल तक काम किया। इस दौरान जब काम में मन नहीं लगा तो नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे थियेटर के लिए समर्पित होकर काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में प्रोफेसर के रूप में काम किया। जब वहां जमा नहीं तो दोबारा फिर भारत का रुख किया। इस बार उन्होंने भारत में रुकने का मन बना लिया था और वो पूरी तरह साहित्य और फिल्‍मों से जुड़ गए। इस दौरान उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं में कई फिल्में बनाई। 

 

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