गंगा एक्सप्रेस-वे पर हादसों ने बढ़ाई चिंता, तेज रफ्तार बन रही काल
सुरक्षित सफर के दावों पर सवाल, ओवरस्पीड से लेकर आवारा पशु तक बन रहे दुर्घटनाओं की वजह

देश के सबसे आधुनिक और अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस गंगा एक्सप्रेस-वे को तेज, सुरक्षित और सुगम सफर का नया विकल्प माना गया था, लेकिन शुरूआत के महज दो महीनों में ही यह एक्सप्रेस-वे संभल जिले में हादसों का नया हॉटस्पॉट बनता नजर आ रहा है। मेरठ से प्रयागराज तक 594 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेस-वे पर जिले की सीमा में अब तक 15 से अधिक बड़े सड़क हादसे हो चुके हैं। इन दुर्घटनाओं में 11 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 32 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। लगातार हो रहे हादसों ने एक्सप्रेस-वे की सुरक्षा व्यवस्था और यातायात नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गंगा एक्सप्रेस-वे को अत्याधुनिक तकनीक से तैयार किया गया है। यहां हाई-रिजॉल्यूशन सीसीटीवी कैमरे, सेंसर आधारित निगरानी प्रणाली, कंट्रोल रूम, पेट्रोलिंग वाहन और इमरजेंसी रिस्पांस सिस्टम जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद हादसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक तभी प्रभावी साबित होगी, जब चालक भी यातायात नियमों का पूरी तरह पालन करें। पुलिस और प्रशासन की शुरुआती जांच में अधिकांश हादसों की वजह ओवरस्पीड, गलत लेन में वाहन चलाना, बिना संकेत दिए अचानक लेन बदलना और लंबी दूरी तय करने के दौरान चालक को झपकी आना सामने आया है। कई मामलों में वाहन इतनी तेज रफ्तार में थे कि चालक नियंत्रण खो बैठे और वाहन डिवाइडर या रेलिंग से टकरा गए। कुछ हादसों में एक वाहन के अचानक रुकने या मुड़ने से पीछे आ रहे वाहन भी चपेट में आ गए। एक्सप्रेस-वे पर कई स्थानों पर मवेशियों के पहुंचने की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा और बढ़ गया है। तेज रफ्तार वाहनों के सामने अचानक पशु आने से चालक के पास संभलने का समय नहीं बचता और बड़ा हादसा हो जाता है। इस समस्या को देखते हुए जिलाधिकारी अंकित खंडेलवाल ने संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजकर एक्सप्रेस-वे की फेंसिंग की ऊंचाई बढ़ाने और कमजोर स्थानों को मजबूत कराने की मांग की है, ताकि पशुओं की आवाजाही पूरी तरह रोकी जा सके।
शहर के दो प्रवेश द्वार, हर दुर्घटना के बाद जागता सिस्टम फिर हो जाता बेपरवाह
सड़क हादसों पर लगाम लगाने के लिए शासन और प्रशासन लगातार दावे करता है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। शहर में प्रवेश के दो प्रमुख मार्ग संभल-गजरौला स्टेट हाईवे पर खग्गूपुरा और संभल-अनूपशहर स्टेट हाईवे पर रायपुर गांव के पास नहर पुलिया आज भी दुर्घटनाओं के सबसे प्वॉइंट बने हुए हैं। यहां आए दिन हो रहे हादसे न केवल सुरक्षा इंतजामों की खामियां उजागर कर रहे हैं, बल्कि यह भी साबित कर रहे हैं कि हर बड़ी दुर्घटना के बाद कुछ दिन तक सक्रिय रहने वाला सिस्टम जल्द ही पुराने ढर्रे पर लौट जाता है।
डिवाइडर बन रहे हादसों का कारण
संभल। स्थानीय लोगों का कहना है कि खग्गूपुरा गांव में डिवाइडर बना दिया है और सड़क भी चौड़ी कर दी गई है लेकिन डिवाइडर से पहले कहीं संकेतक नहीं हैं। ऐसे में डिवाइडर ही हादसों का कारण बन रहे हैं। दोनों स्थानों पर चेतावनी संकेत, पर्याप्त रोशनी, स्पीड कंट्रोल के प्रभावी उपाय और ट्रैफिक प्रबंधन की जरूरत महसूस की जा रही है। हादसे होने पर प्रशासनिक अधिकारी निरीक्षण करते हैं, निर्देश जारी होते हैं और कार्रवाई का आश्वासन मिलता है, लेकिन कुछ समय बाद व्यवस्थाएं फिर ढीली पड़ जाती हैं। इसका खामियाजा आम लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर चुकाना पड़ता है।
ट्रैफिक प्रबंधन बने प्रभावी
संभल। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सड़क चौड़ी कर देने या डिवाइडर बना देने से दुर्घटनाएं नहीं रुकेंगी। ब्लैक स्पॉट पर वैज्ञानिक तरीके से ट्रैफिक प्रबंधन, गति नियंत्रण, रिफ्लेक्टर, हाईमास्ट लाइट, चेतावनी बोर्ड और नियमित निगरानी जैसी व्यवस्थाएं जरूरी हैं। जब तक इन दोनों प्रवेश मार्गों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनाया जाएगा, तब तक सड़क हादसों का सिलसिला थमना मुश्किल होगा।
हादसे कम हों, इसके लिए विभाग द्वारा खग्गूपुरा में सड़क चौड़ी कर दी गई है और डिवाइडर लगा दिए हैं लेकिन अभी संकेतक नहीं लगे हैं, जिससे वाहन चालकों को डिवाइडर की जानकारी नहीं हो पाती और हादसा हो जाता है।
हरिओम सिंह।
स्टेट हाईवे पर रायपुर गांव के पास नहर के ऊपर बने पुल से पहले वाहन चालक को सामने का नहीं दिखता, जिससे अक्सर हादसे हो रहे हैं। यहां रोशनी की व्यवस्था हो और पर्याप्त संकेतक लगाए जाएं।
सुरेंद्र सिंह।
स्टेट हाईवे पर खग्गूपुरा गांव व रिसॉर्ट के पास डिवाइडर बन गया है, सड़क चौड़ी हो रही है। अभी संकेतक आदि लगाने का काम चल रहा है।
जगरोशन, यातायात प्रभारी।


