अगस्त क्रांति के योद्धा को मिली थी 15 साल कैद की सजा
स्वतंत्रता सेनानी राज कुमार की गिरफ्तारी के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भभुआ में भारी जनाक्रोश देखने को मिला। राजकुमार को 15 वर्ष की सजा सुनाई गई। पुलिस की गोलीबारी में अंतु राम शहीद हुए। उनका समाजसेवा से नाता आज भी बना रहा।

स्वतंत्रता सेनानी राज कुमार की गिरफ्तारी के खिलाफ सड़कों पर दिखा था जनाक्रोश भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जुलूस पर चलाई गई गोली से शहीद हुए थे अंतु बाबू (पेज चार) भभुआ, नगर संवाददाता। देश में अगस्त क्रांति सवाब पर था। इसकी गूंज कैमूर में भी पहुंची थी। गांव-मुहल्ले के युवक इस आंदोलन में शिरकत करने लगे। इसी आंदोलन में चैनपुर के तिवई निवासी राजकुमार लाल को अंग्रेजी हुकूमत ने 15 साल कैद और 400 रुपये का अर्थदंड की सजा सुनाई थी। एक जुलाई 1901 को जन्मे राजकुमार का परिवार 1928 में भभुआ में रहने आ गया। वर्ष 1921 में कांग्रेस की सदस्यता लेने के बाद वह लगातार राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ते गए। वर्ष 1939 में भभुआ नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए, लेकिन अगले ही वर्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आह्वान पर वह पद छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए।
जनाक्रोश और गिरफ्तारी
9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी सहित देश के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भभुआ में भी आंदोलन तेज हो गया। 10 अगस्त को राजकुमार बाबू के आवास पर प्रमुख आंदोलनकारियों की गुप्त बैठक हुई। इसमें विशाल जुलूस निकालने का निर्णय लिया गया। टॉमी पुलिस को इसकी भनक लगी तो उनके घर की तलाशी ली गई। कई दस्तावेज जब्त किए गए। 11 और 12 अगस्त को बाजार व शिक्षण संस्थानों में पूर्ण हड़ताल रही। इससे अंग्रेजी प्रशासन में खलबली मच गई। 13 अगस्त को राजकुमार लाल के नेतृत्व में भभुआ में विशाल जुलूस निकाला गया। आंदोलनकारियों ने नगरपालिका कार्यालय और डाकघर पर तिरंगा फहराया। पुलिस ने झंडा उतार दिया। इससे आंदोलनकारियों का आक्रोश बढ़ गया। विरोध में डाकघर के कागजात जला दिए गए। हाई स्कूल में तालाबंदी की। पशु फाटक खोलकर मवेशियों को मुक्त कर दिया गया। उसी दिन शाम को अनुमंडलाधिकारी के आदेश पर राजकुमार लाल को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में भभुआ में भारी जनाक्रोश हुआ। पुलिस की गोलीबारी में अंतु राम शहीद हुए और कई आंदोलनकारी घायल हो गए।
सजा और समाजसेवा
साढ़े 15 साल की सजा भी नहीं तोड़ सकी हिम्मत चार-पांच दिन बाद राजकुमार लाल को अन्य आंदोलनकारियों के साथ दोबारा गिरफ्तार किया गया। विभिन्न मुकदमों में उन्हें कुल 15 वर्ष छह माह के कारावास और 400 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। जेल में रहने के दौरान उनके पिता का निधन हो गया। बाद में महात्मा गांधी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के निर्देश पर उनके शुभचिंतकों ने उच्च न्यायालय में अपील की। इसके बाद उन्हें अन्य साथियों के साथ पटना कैंप जेल से रिहा किया गया। आजादी के बाद भी उनका समाजसेवा से नाता बना रहा। वर्ष 1952 में राज्य सरकार ने उन्हें चार हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी। एक फरवरी 1960 को उनका निधन हो गया। शहीद स्मारक में आज भी जीवित है संघर्ष की कहानी भभुआ के पुराने प्रखंड कार्यालय परिसर में बना शहीद स्मारक स्वतंत्रता संग्राम के उन वीरों की याद को संजोए हुए है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। यह स्मारक नई पीढ़ी को बताता है कि आजादी केवल इतिहास की किताबों का विषय नहीं, बल्कि लाखों लोगों के त्याग, तपस्या और बलिदान का परिणाम है। फोटो- 8 अगस्त भभुआ- 6 कैप्शन- भभुआ के पुराने प्रखंड कार्यालय परिसर में स्वतंत्रता संग्राम के वीरों के त्याग और बलिदान की याद दिलाता स्मारक।


