पट्टे की जमीन के लिए फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट का खेल, 98 मामले बेनकाब

हिन्दुस्तान, लखनऊ
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गरीब दलित काश्तकारों की बेशकीमती जमीनें बिल्डर फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट और मामूली लालच के सहारे औने-पौने दाम में हड़प रहे हैं। प्रशासन ने छह महीने में

पट्टे की जमीन के लिए फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट का खेल, 98 मामले बेनकाब

ज्ञान प्रकाश, मुख्य संवाददाता, लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गरीब दलित काश्तकारों की बेशकीमती जमीनें बिल्डर मामूली लालच दिखाकर औने पौने दाम में हड़प रहे हैं। इसके लिए फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट का सहारा लिया जा रहा है, और प्रशासन की जांच में महज छह महीने के भीतर ऐसे 98 फर्जी प्रमाणपत्र पकड़े जा चुके हैं। मामले का खुलासा तब हुआ जब भू उपयोग परिवर्तन और असंक्रमणीय से संक्रमणीय की प्रक्रिया के दौरान सीएमओ कार्यालय से इन प्रमाणपत्रों की पुष्टि नहीं हो सकी। इसके बाद डीएम ने पूरे मामले की जांच बैठा दी है। जांच में हुआ बड़ा खुलासा, न अस्पताल मिला न डॉक्टर

जांच की प्रक्रिया

एडीएम ट्रांस गोमती की जांच में सामने आया कि पकड़े गए ज्यादातर मेडिकल प्रमाणपत्रों में या तो संबंधित अस्पताल मौके पर मिला ही नहीं, या फिर जिस डॉक्टर के नाम पर प्रमाणपत्र जारी हुआ था, उसे इसकी भनक तक नहीं थी। यानी ये सारे प्रमाणपत्र पूरी तरह फर्जी निकले। इस खुलासे के बाद डीएम ने सभी अपर जिलाधिकारियों को सतर्क कर दिया है।

अनियोजित कॉलोनियों का विकास

तेज़ी से बन रहे हाइवे के साथ बढ़ रहीं अनियोजित कॉलोनियां

लखनऊ में जिस रफ्तार से नई सड़कें और हाइवे बन रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा तेजी से अनियोजित कॉलोनियां भी खड़ी होती जा रही हैं। एलडीए और आवास विकास परिषद की नई परियोजनाओं की अधिसूचना जारी होने से पहले ही बिल्डर किसानों से औने पौने दाम में जमीनें खरीद ले रहे हैं। खास बात यह है कि ज्यादातर बेशकीमती जमीनें पट्टे में मिली हुई हैं, और बिल्डर नियम-कानून के एक पेंच का फायदा उठाकर इन्हें हथिया रहे हैं।

जमीन बेचने का औचित्य

बीमारी के नाम पर मिलती है छूट, यही बना रहा हथियार

पट्टे की शर्तों के अनुसार तय समय सीमा के बाद एससी-एसटी काश्तकार परिवार में किसी के गंभीर रूप से बीमार होने की स्थिति में ही जमीन बेची जा सकती है। यह प्रावधान उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 98(1) और राजस्व संहिता नियमावली 2016 के नियम 99(8) के तहत आता है। कानूनन कोई भी अनुसूचित जाति का व्यक्ति अपनी जमीन किसी गैर एससी यानी सामान्य या ओबीसी व्यक्ति को नहीं बेच सकता, इसके लिए जिलाधिकारी से विशेष अनुमति लेनी होती है। डीएम कुछ खास परिस्थितियों में ही यह अनुमति देते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख आधार है गंभीर बीमारी के इलाज के लिए धन की ज़रूरत। नियमावली के नियम 99(8) बी के तहत इसके लिए किसी अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर या सीएमओ द्वारा जारी औपचारिक मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य है, और बिल्डर इसी प्रावधान का दुरुपयोग कर रहे हैं।

फर्जीवाड़े की जांच

मोहर असली जैसी, हस्ताक्षर भी हूबहू मिलते जुलते

जांच में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया, जिसमें एक काश्तकार ने अपनी मां के कैंसर से पीड़ित होने का हवाला देते हुए आवेदन किया था। जब अपर जिलाधिकारी ने मामला सीएमओ कार्यालय भेजा तो पता चला कि अस्पताल का अस्तित्व तो था, लेकिन जिस लेटर हेड पर सर्टिफिकेट बना था वह असली नहीं था। डॉक्टर के हस्ताक्षर भी हूबहू मिलते जुलते थे, लेकिन असल में उन्होंने ये हस्ताक्षर किए ही नहीं थे। जांच में ऐसे कई और मामले भी पकड़ में आए हैं, जिससे साफ है कि यह पूरा एक संगठित फर्जीवाड़ा है।

सामान्य प्रश्न

फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट कितने पकड़े गए हैं?
प्रशासन ने महज छह महीने के भीतर 98 फर्जी प्रमाणपत्र पकड़े गए हैं।
Gyan Prakash

लेखक के बारे में

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ज्ञान प्रकाश पिछले 23 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में ' हिन्दुस्तान अखबार' में एविएशन सेक्टर कवर कर रहे हैं।

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ज्ञान प्रकाश ने अपने करियर की शुरुआत 2003 में की। कई प्रमुख अखबारों में काम करते हुए 2008 में हिन्दुस्तान अखबार में कदम रखा। और और वर्तमान में हिन्दुस्तान अखबार में सेवाएं दे रहें हैं।

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