अंग्रेजी हुकूमत के खात्मे के बाद अभी तक शहीदों को नहीं मिला शहादत का सिला
13 एसआईडीडी 26 : अंग्रेज सैनिकों का स्मारक, वर करने वाले अमर सपूतों के नाम एक स्मारक तक नहीं : फिरंगियों ने शहीदों को पिंडारी बताकर अमरगढ़ ताल में फेंक

डुमरियागंज, हिन्दुस्तान संवाद। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में हंसते-हंसते जान न्योछावर करने वाले अमर शहीदों को अब तक एक अदद स्मारक भी नसीब नहीं हो सका है। इतना ही नही फिरंगियों ने शहीदों को पिंडारी बताकर उनकी लाशों को अमरगढ़ ताल में फेंक दिया था। शहीदों के माथे पर लगाया गया कलंक आज भी कायम है। शहीद स्थल पर बने शहीद स्मारक गेट को छोड़ दिया जाए तो आज भी इन शहीदों की शहादत उपेक्षित है。
अमरगढ़ के क्रांतिकारी
1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की क्रांति की आग जब देश में शांत होने लगी थी तो उसी वक्त अमरगढ़ के क्रांतिकारियों ने देश को आजाद करने की एक नई ज्योति जलाई थी। क्रांतिकारियों के दल ने उस समय जंगल में रुके फिरंगियों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। जब आन्दोलन की धार तेज हो गई तो अंग्रेजों को इनके मुकाबले के लिए बाम्बे आर्मी की पूरी बटालियन बुलानी पड़ी थी। अमरगढ़ के इतिहास का आगाज 1857 की क्रांति के बाद हुआ था। लखनऊ में फिरंगियों से शिकस्त खाने के बाद अवध क्रांति की नायिका बेगम हजरत महल नेपाल की तरफ जाने लगीं। करीब तीन हजार विश्वास पात्र सैनिकों के साथ उनका काफिला उत्तर दिशा की तरफ चल दिया। बलरामपुर स्टेट जो उस समय अंग्रेजों का खास माना जाता था। उसकी नजरों से बचते हुए बेगम घने जंगलों से होकर डुमरियागंज क्षेत्र के हल्लौर गांव स्थित नौरंगियां बाग पहुंची। एक रात वहां ठहरने के बाद बेगम को पता चला कि इसकी जानकारी फिरंगियों को हो गई है। वह अपनी सैनिकों की टुकड़ी के साथ नेपाल के भालूवांग पहुंच गईं। वहां पर उस समय के सामंत ने बेगम को इस शर्त पर अपने यहां पनाह दी थी कि वह अपने सैनिकों को वापस भेज दें। बेगम ने ऐसा ही किया। मगर वापस लौट रहे कुछ सैनिकों ने सोच समझकर डुमरियागंज के अमरगढ़ जंगल में अपना ठिकाना बना लिया। यहीं से ये सैनिक फिरंगियों के खिलाफ लोगों में आजादी का दम भरने लगे। इसकी जानकारी अंग्रेजों को हुई तो वे सैनिकों का दमन करने के लिए पहुंच गए। शुरुआती युद्ध में अंग्रेजी फौज के कमांडर आफ चीफ एल्ड्रीन गुशन और उसके साथ आए सैनिकों को मुंह की खानी पड़ी। इस युद्ध में वीर सपूतों ने अंग्रेजी फौज के सभी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था। आखिरकार आजादी के दीवाने सैनिकों को समाप्त करने के लिए अंग्रेजों ने अपनी बाम्बे आर्मी की 10 हजार सैनिकों की पूरी फौज वहां पर बुला ली। इसके बाद जंगल को चारों ओर से घेरकर एक-एक सैनिक को मौत के घाट उतार दिया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने आजादी के इन वीर सपूतों को पिंडारी बतातें हुए करीब 80 लाशों को अमरगढ़ ताल में फेंकवा दिया और कई लोगों को राप्ती नदी में डुबोकर मार दिया। तब से लेकर आज तक आजादी के इतिहास का गवाह अमरगढ़ ताल और शहीदों की शहादत उपेक्षित है। शहीदों की याद में एक अदद स्मारक तक नहीं बना है जबकि फिरंगियों ने अपने सैनिकों की याद में स्मारक के साथ विशाल गेट का निर्माण करवा दिया था जो आज भी शहीदों की शहादत को मुंह चिढ़ा रहा है。
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स्थानीय लोगों की राय
बोले लोग
जंगे आजादी के समय डुमरियागंज की धरती पर अंग्रेजों द्वारा स्थानीय लोगों को शहीद कर दिया गया था। जिसका प्रमाण रोडवेज से मैनहा गांव जाने वाले मार्ग पर स्थित गेट और अंग्रेजों के बना स्मारक दर्शा रहा है। यहां के शहीदों को कोई सम्मान अब तक नहीं मिल पाया है। जिस पर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।
दिनेश पाण्डेय, अगया
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डुमरियागंज रोडवेज के मालीमैनहा जाने वाले बंधे पर अंग्रेजों के समय का गेट मौजूद है। यहां पर हुए संघर्ष में अंग्रेज अधिकारी और एक घुड़सवार सिपाही मर गया। जिसकी कब्रें आज भी स्मारक अमरगढ़ स्थल पर हैं। देश के शहीदों के लिए फिक्र न करना अच्छा नहीं है।
तुफैल अहमद, डुमरियागंज
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जिस स्थान पर अपनी जान को भारत माता की रक्षा करते हुए सैकड़ों भारतीय शहीद हो गए इस स्थल पर शहीदों के नाम से अब तक कोई स्थल का निर्माण न होना चिंतनीय है। इस पर सरकार को ध्यान देकर कार्य करने की जरूरत है ताकि आगामी पीढ़ी को भी कोई जानकारी हो सके।
एडवोकेट शक्ति प्रकाश अग्रहरि, डुमरियागंज
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डुमरियागंज में अंग्रेजों व भारतीयों के मध्य आजादी को लेकर जंग हुई थी। जहां तक हमें जानकारी है अमरगढ़ताल के पास एक आम का बाग था। वहां मारे गए अंग्रेज सैनिकों को दफन किया गया जो स्मारक आज भी मौजूद है। देश के लिए शहीद हुए लोगों का भी स्मारक बनना चाहिए था जो नहीं बना। एडवोकेट मलिक इकबाल युसुफ, डुमरियागंज


