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पहली बारः 50 हजार भारतीय महिलाओं को मिला तापमान-बीमा

भारत की 50 हजार महिलाओं को पहली बार बीमा भुगतान हुआ है, जो अत्यधिक तापमान पर दिया जाता है.खुद का रोजगार करने वालीं 50 हजार भारतीय महिलाओं को तापमान-बीमा का भुगतान किया गया है. पहली बार ऐसा भुगतान हुआ...

पहली बारः 50 हजार भारतीय महिलाओं को मिला तापमान-बीमा
डॉयचे वेले,दिल्लीWed, 12 Jun 2024 01:00 PM
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भारत की 50 हजार महिलाओं को पहली बार बीमा भुगतान हुआ है, जो अत्यधिक तापमान पर दिया जाता है.खुद का रोजगार करने वालीं 50 हजार भारतीय महिलाओं को तापमान-बीमा का भुगतान किया गया है. पहली बार ऐसा भुगतान हुआ है. तापमान बीमा एक ऐसी योजना है जिसके तहत अत्यधिक गर्मी होने पर उन महिलाओं को भुगतान किया जाएगा जिनका कामकाज गर्मी के कारण प्रभावित हुआ हो. 18 मई से 25 के बीच भारत के कई शहरों में तापमान 40 डिग्री को पार कर गया था. इसी की एवज में राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की इन महिलाओं को 400 रुपये का भुगतान किया गया है. तीन करोड़ रुपये का भुगतान यह योजना अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संस्था ‘क्लाइमेट रेजिलिएंस फॉर ऑल' (CRA) ने भारत में महिलाओं के लिए काम करने वाली संस्था ‘सेल्फ-इंप्लॉयड विमिंज एसोसिएशन' (SEWA) के साथ मिलकर शुरू की है.

सीआरए की सीईओ कैथी बॉगमन मैक्लॉयड ने कहा, "यह पहली बार है जब सीधे नगद भुगतान को बीमा योजना के साथ जोड़ा गया है ताकि उन महिलाओं की आर्थिक मदद की जा सके, जिनकी आय अत्यधिक गर्मी के कारण प्रभावित हो रही है.” 400 रुपये के इस भुगतान के अलावा लगभग 92 फीसदी महिलाओं को करीब 1,600 रुपये तक का अतिरिक्त भुगतान भी मिला जो स्थानीय परिस्थितियों और गर्मी की अवधि के आधार पर तय होता है. इस योजना के तहत कुल तीन करोड़ रुपये का भुगतान किया गया. यह बीमा योजना स्विट्जरलैंड की कंपनी स्विस री और भारत के आईसीआईसीआई लोंबार्ड के सहयोग से चलाई गई है. जलवायु परिवर्तन और बीमा योजनाएं बहुत से नीति विशेषज्ञ बीमा योजनाओं को मौसमी आपदाओं से प्रभावित होने वाले कमजोर तबकों की आर्थिक मदद का एक जरूरी जरिया मानने लगे हैं. ऐसी योजनाएं कई देशों में शुरू हो गई हैं.

संयुक्त राष्ट्र की संस्था युनाइटेड नेशंस डेवलेपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) ने इंश्योरेंस एंड रिस्क फाइनेंस फैसिलिटी के नाम से एक संगठन स्थापित किया है. यह संगठन दुनियाभर में इश्योरेंस क्षेत्र की बड़ी कंपनियों और सरकारों के साथ मिलकर काम करता है. 33 देशों में काम कर रहे इस संगठन का मकसद जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली आपदाओं के वक्त एक मजबूत वित्तीय आधार उपलब्ध कराना है, जो कमजोर तबकों की मदद कर सके. यूएनडीपी के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली आपदाओं के लिए सबसे कम तैयारी विकासशील देशों में ही है. इनमें भी सबसे ज्यादा खतरा महिलाओं को है क्योंकि दुनियाभर की गरीब आबादी में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है. गरीबों पर सबसे बुरी मार यूएनडीपी में इंश्योरेंस एंड रिस्क फाइनेंस फैसिलिटी के टीम लीडर यान केलेट लिखते हैं कि बीमा योजनाएं और आपदाओं के खिलाफ वित्तीय मदद ना सिर्फ जिंदगियां बचा सकती है बल्कि संयुक्त राष्ट्र के विकास लक्ष्यों को हासिल करने में भी अहम भूमिका निभा सकती है. केलेट कहते हैं, "बीमा ना होने से मौसमी आपदाओं के कारण लाखों-करोड़ों लोग गरीबी की गर्त में गिर सकते हैं क्योंकि विकासशील देशों में ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है जिनके पास आपदाओं के कारण होने वाले नुकसान से उबरने के लिए संसाधन ना के बराबर हैं.

” संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण प्रोग्राम (यूएनईपी) का अनुमान है कि इस सदी के आखिर तक जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र जल स्तर बढ़ने से दुनियाभर में लगभग डेढ़ करोड़ लोग प्रभावित होंगे. इनमें से बहुत से लोगों के गरीबी के मुंह में चले जाने की आशंका है. सिर्फ 2030 तक 13 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी की रेखा से नीचे जा सकते हैं. विशेषज्ञ कहते हैं कि ये लोग जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े पीड़ित होंगे जबकि ग्लोबल वॉर्मिंग में इनका योगदान सबसे कम है. दुनिया के सबसे गरीब साढ़े तीन अबर लोग कुल कार्बन उत्सर्जन के सिर्फ 10 फीसदी के लिए जिम्मेदार हैं. विवेक कुमार (रॉयटर्स).