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लोकसभा चुनाव: मुद्दा नहीं, मोदी पर केंद्रित रहा सात चरणों का चुनाव प्रचार

pm narendra modi address public meeting at solan  hp   bjp twitter may 13  2019

इस बार सात चरणों में लंबी अवधि तक चला चुनाव प्रचार अभियान मोदी के पक्ष या विरोध पर टिका रहा। पिछले चुनाव की तुलना में मोदी कहीं ज्यादा प्रचार के केंद्र में नजर आए। पिछले 2014 के आमचुनाव में कांग्रेस के प्रति आक्रोश और भाजपा व मोदी के नेतृत्व के प्रति आकर्षण था।

लेकिन इस बार भाजपा और उनके उम्मीदवारों के प्रति उदासीन भाव होने के बावजूद मोदी का आकर्षण बना रहा। सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार का कहना है कि मोदी पिछले चुनाव की तुलना में इस बार ज्यादा सेंटर में थे और इस मायने में पूरा चुनाव बहुत अलग दिखाई पड़ा। या तो मोदी के पक्ष में वोट मांगे जा रहे थे या मोदी को हटाने के लिए वोट मांगे जा रहे थे। असल मुद्दों के बजाए इफोरिया क्रिएट करने [माहौल बनाने] का प्रयास किया।

पार्टियों के प्रति आकर्षण नहीं
संजय कुमार ने कहा, 2014 के चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश था। भाजपा और मोदी दोनों के लिए आकर्षण था। भाजपा और मोदी दोनों को वोट मिल रहा था। लेकिन इस बार कांग्रेस के लिए आक्रोश नहीं दिखाई पड़ा। लेकिन कोई कांग्रेस के लिए आकर्षण या पॉजिटिव माहौल रहा हो ऐसा भी नहीं है। न तो विरोध था, न तो आकर्षण। वहीं भाजपा के लिए भी एक तरह से मतदाता इस बार उदासीन था। लेकिन मोदी के लिए मतदाताओं में बहुत ज्यादा उत्सुकता नजर आई। कोर समर्थकों में पिछले चुनाव की तुलना में इस बार ज्यादा उत्साह मोदी के नाम पर देखने को मिला।

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भाजपा राष्ट्रवाद पर रही केंद्रित
जानकारों के मुताबिक 2014 में भाजपा के पास बहुत से मुद्दे थे। स्वच्छ सरकार, बेरोजगारी दूर करेंगे लेकिन इस बार भाजपा कोई ठोस सकारात्मक वायदा लेकर नहीं आई। भाजपा ने दो-तीन चीजों के इर्द गिर्द रखा। चौकीदार चोर है के नारे से  बचने के लिए भ्रष्टाचार का मुद्दा सामने रखकर राजीव गांधी से लेकर पंडित नेहरु तक को प्रचार में लाया गया। पूरे सातवें चरण तक प्रचार में पाकिस्तान, बालाकोट, पुलवामा का ज्यादा जिक्र किया गया। पीएम मोदी और भाजपा ने राष्ट्रवाद की पिच पर ज्यादातर प्रचार केंद्रित रखा। बीच-बीच में क्षेत्रीय नेताओं की छवि पर प्रहार करने की कोशिश की गई।

कांग्रेस का प्रचार भ्रम का शिकार
जानकारों की मानें तो पूरे चुनाव में कांग्रेस का प्रचार अभियान भ्रमित नजर आया। कांग्रेस ने बेरोजगारी से शुरु किया, नोटबंदी पर गए, जीएसटी पर रहे। चौकीदार चोर है के नारे के साथ राफेल लेकर आए। लेकिन किसी मुद्दे को दिशा देने की कमी स्पष्ट नजर आई। इनका कोई भी मुद्दा उत्साह पैदा नहीं कर पाया। बाद में एक पॉजिटिव पिच न्याय पर प्रचार केंद्रित करने का प्रयास हुआ। लेकिन यह भी नहीं चला। संजय कुमार इसकी वजह बताते हुए कहते हैं कि शायद लोगों को कांग्रेस के सरकार बनाने का भरोसा नहीं था  या फिर उन्हें यह लगा कि अगर जोड़तोड़ कर सरकार बन भी गई तो वे इस तरह की योजना अमल में नहीं ला पाऐंगे। इसी भरोसे की कमी का फायदा भाजपा ने उठाया।

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नकारात्मकता से भरा रहा अभियान
जानकारों के मुताबिक पूरा प्रचार बहुत ही नकारात्मकता से घिरा रहा। कहीं सकारात्मक चीज नहीं देखने को मिली कि आप आएंगे तो क्या करेंगे। भाषा की गरिमा को इस बार सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। हर तरफ से मर्यादाएं तार तार हुई। वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने और अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए इस तरह की रणनीति अपनाई गई।

वास्तविक मुद्दे क्यों गायब
जानकार मानते हैं कि फ्लोटिंग वोट का अनुपात कम हो रहा है। राजनीतिक दल मानने लगे हैं कि मुद्दे की ज्यादा जरूरत नहीं इफोरिया क्रियेट होता रहे। चुनाव एक व्यक्ति पर केंद्रित रहा इसलिए भी अन्य मुद्दे नदारद रहे।

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एंटी इन्कंबेसी का असर नहीं
जानकारों के मुताबिक इस चुनाव प्रचार की खास बात यह भी रही कि चुनाव में एंटी इंकेंबेसी की आहट नहीं दिखाई पड़ी। लोगों की नाराजगी कहीं-कहीं दिखती थी। लेकिन उसे सरकार विरोधी हवा नहीं कहा जा सकता।

क्षेत्रीय दलों ने मोदी हटाओ पर रखा ध्यान
क्षेत्रीय दलों ने मोदी हटाओ पर अपना प्रचार अभियान चलाया। मोदी हटाओ देश बचाओ जैसे नारे दिए गए। इसी कोर थीम पर विपक्षी एकजुटता का भी प्रयास किया गया।

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  • Web Title:Focus on Modi in all seven phases election campaign