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Hindi News देशसोशल इंजीनियरिंग फेल, मोदी पर अधिक निर्भरता; लोकसभा चुनाव के नतीजों से भाजपा के लिए 5 सबक

सोशल इंजीनियरिंग फेल, मोदी पर अधिक निर्भरता; लोकसभा चुनाव के नतीजों से भाजपा के लिए 5 सबक

Chunav Result: उत्तर प्रदेश में भगवा पार्टी का सबसे खराब प्रदर्शन रहा, जहां से सबसे ज्यादा सांसद संसद आते हैं। हरियाणा, राजस्थान, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में भी काफी खराब प्रदर्शन रहा।

सोशल इंजीनियरिंग फेल, मोदी पर अधिक निर्भरता; लोकसभा चुनाव के नतीजों से भाजपा के लिए 5 सबक
Himanshu Jhaलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्ली।Wed, 05 Jun 2024 06:44 AM
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Lok Sabha Election Result: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को इस लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला है, लेकिन 240 सीटों पर जीत दर्ज करके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। अपने सहयोगियों के साथ मिलकर फिर एकबार सरकार बनाने के लिए तैयार है। नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बनेंगे, जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान 'अबकी बार, 400 पार' का नारा दिया था। यह चुनाव बीजेपी के लिए एक बड़ी सबक है। हालांकि भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि 1984 के बाद भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसे तीसरी बार शासन करने का जनादेश मिला है।" वहीं, विपक्ष भाजपा की अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार रोकने का जश्न मना रहा है।

भाजपा के रणनीतिकारों ने पार्टी की कम होती ताकत के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग से मिले ठंडे समर्थन, जाति आधारित कोटा खत्म करने के इरादे के बारे में विपक्ष के बयानों पर काबू पाने में असमर्थता, महंगाई और नौकरी जाने के खिलाफ गुस्से को नियंत्रित करने में विफलता और विकास के विमर्श पर ध्रुवीकरण को हावी होने देने को जिम्मेदार ठहराया है।

उत्तर प्रदेश में भगवा पार्टी का सबसे खराब प्रदर्शन रहा, जहां से सबसे ज्यादा सांसद संसद आते हैं। हरियाणा, राजस्थान, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में भी काफी खराब प्रदर्शन रहा। पार्टी का मोदी पर अत्यधिक निर्भरता और सोशल इंजीनियरिंग पर बीजेपी ढीली पकड़ का असर नतीजों पर देखने को मिला है।

सोशल इंजीनियरिंग
ओबीसी ने भाजपा और मोदी को पूरा समर्थन दिया था। 2014 और 2019 में भी भाजपा की जीत में उनका बड़ा योगदान था। पार्टी के एक नेता ने कहा, “यूपी और राजस्थान जैसे राज्यों में ओबीसी का प्रतिरोध देखने को मिला है, जहां उन्होंने उच्च जाति के ठाकुरों के वर्चस्व पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है। हरियाणा में पार्टी जाटों को शांत नहीं कर सकी। यहां जातिगत गठबंधन मजबूत नहीं थे।” 

इसके अलावा कांग्रेस के द्वारा बार-बार यह कहना कि भाजपा संविधान में बदलाव करेगी और जाति-आधारित कोटा खत्म करेगी, इस मुद्दे ने भी भगवा पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया। सामाजिक कल्याण योजनाओं के माध्यम से दलितों को लुभाने के उसके प्रयासों को विफल कर दिया। भाजपा नेता ने कहा कि भाजपा को एससी और ओबीसी समुदाय के प्रति अपने प्रयासों को नए सिरे से शुरू करना होगा और जातियों के गठबंधन को एक साथ लाने के अपने सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल को बनाए रखना होगा। 

एक दूसरे नेता ने कहा, "हरियाणा में भाजपा ने सरकार का नेतृत्व करने के लिए एक ऐसे चेहरे को चुना जो एक गैर-प्रमुख जाति से है। संभावना है कि पार्टी को इस नीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है।" आपको बता दें कि मनोहर लाल खट्टर को सीएम पद से हटाने के बाद पार्टी ने गैर-जाट समुदायों को एकजुट करने के लिए नायब सिंह सैनी को हरियाणा का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया था और उम्मीद थी कि इससे पार्टी एक दशक की सत्ता विरोधी लहर से उबर पाएगी।  राज्य की सभी 10 सीटों पर जीत हासिल करने वाली भाजपा को 5 सीटें गंवानी पड़ीं। 

नेतृत्व
इस नतीजे के बाद केंद्र में संगठन में फेरबदल की उम्मीद है। इस महीने जेपी नड्डा के कार्यकाल पूरा होने के बाद नए पार्टी अध्यक्ष की घोषणा की जाएगी। नड्डा को जनवरी में विस्तार दिया गया था। प्रदेश नेतृत्वों की भी समीक्षा की जाएगी। उन राज्यों में नए चेहरों की नियुक्ति की उम्मीद है जहां कैडर और नेतृत्व के बीच संबंध ठीक नहीं हैं। भाजपा के एक नेता ने कहा, "यूपी में चुनाव के दौरान अलग-अलग काम करने की शिकायतें थीं। कर्नाटक में भी एकजुट टीम नहीं है।"

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  पार्टी और पीएम मोदी के पीछे अपना पूरा जोर लगा दिया है। आरएसएस ने राज्यों में मजबूत नेताओं को तैयार करने की आवश्यकता बताई है,  जो चुनावी चुनौतियों के माध्यम से पार्टी को आगे बढ़ा सकें। आरएसएस के एक पदाधिकारी ने कहा, "पार्टी के पास कल्याणकारी योजनाओं का एक मजबूत मॉडल है। योजनाओं को लागू करने और वितरण का अच्छा रिकॉर्ड है, लेकिन इसमें काम करने वाले एक से अधिक लोगों की जरूरत है। पीएम की प्रतिबद्धता और लोकप्रियता से कमजोर उम्मीदवारों को चुनाव जीतने या उम्मीदवारों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को मात देने में मदद करने की उम्मीद नहीं की जा सकती है।" 

पदाधिकारी ने इस अटकल को भी खारिज कर दिया कि इस फैसले से संघ-भाजपा संबंधों में नया मोड़ आएगा। उन्होंने कहा, "आरएसएस भाजपा की नीतियों का समर्थन करता है। एक सशक्त सरकार का होना राष्ट्र के हित में होता है।"

सहयोगी
लोकसभा चुनाव के नतीजों में के बाद दो सहयोगियों टीडीपी और जेडीयू की भूमिका बढ़ गई है। भाजपा को सहयोगियों के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा। सरकार में उनकी भागीदारी बढ़ानी होगी। कानून बनाने से पहले उसे उनके विचारों पर भी विचार करना होगा। पिछले पांच वर्षों में पार्टी ने अपने कुछ सबसे पुराने सहयोगियों, शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना (यूबीटी) के साथ संबंध तोड़ लिए हैं। दोनों दलों ने भाजपा पर सहयोगियों पर दबाव बनाने का आरोप लगाया है। पार्टी पर महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में फूट डालने का भी आरोप लगाया गया।

2019 में सरकार बनाने के लिए भाजपा को सहयोगियों की जरूरत नहीं थी, लेकिन उसने सभी सहयोगियों जेडीयू, आरपीआई (ए), एलजेपी, एसएडी और शिवसेना को मोदी कैबिनेट का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया। पार्टी ने उन आरोपों का भी खंडन किया कि उसने सहयोगियों की चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया। 

संगठन
पिछले दो लोकसभा चुनावों में विकास के एजेंडे के साथ राष्ट्रवादी नैरेटिव से समान परिणाम नहीं मिले। भाजपा और संघ ने मोदी द्वारा चुनावी भाषणों में अल्पसंख्यकों के संदर्भ को विपक्ष की तुष्टीकरण की नीति के जवाब के रूप में बचाव किया, लेकिन नेताओं का एक वर्ग ऐसा भी है जिसने कहा कि विकास के एजेंडे पर टिके रहना अधिक सुरक्षित दांव होता। नाम न बताने की शर्त पर पार्टी के एक तीसरे नेता ने कहा, "ध्यान राशन और शासन (मुफ्त खाद्यान्न और शासन) पर होना चाहिए था।"

सेना के लिए नई भर्ती नीति, ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरियों की कमी और विवादास्पद बयान देने वाले नेताओं पर लगाम न लगा पाने के खिलाफ लोगों के मन में गुस्से की भावना को समझने में भी भाजपा विफल रही। 17वीं लोकसभा में अयोध्या का प्रतिनिधित्व करने वाले लल्लू सिंह और राजस्थान के नागौर से उम्मीदवार ज्योति मिर्धा सहित कई सांसदों ने संविधान में बदलाव की आवश्यकता के बारे में बात की थी। संयोग से दोनों ही चुनाव हार गए।