किसानों को मिलेगी प्याज नर्सरी के खराब होने की चिंता से राहत
बारिश में प्याज की गठिया तकनीक बन सकती है वरदान झांसी,संवाददाताजो किसान प्याज की खेती करते है और नर्सरी लगाए हुए है उनके लिए गठिया तकनीक वरदान बन सकती

झांसी। जो किसान प्याज की खेती करते है और नर्सरी लगाए हुए है उनके लिए गठिया तकनीक वरदान बन सकती है। साथ ही किसानों को नर्सरी के खराब होने की चिंता से राहत मिलेगी। केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने कहा कि किसानों को इस तकनीक से फायदा होगा। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयके सब्जी विभागाध्यक्ष डॉ. राजेश कुमार सिंह ने बुंदेलखंड सहित वर्षा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों को खरीफ मौसम में प्याज उत्पादन के लिए ‘गठिया तकनीक’ अपनाने की सलाह दी है। उन्होंने बताया कि सामान्यत: खरीफ प्याज की नर्सरी तैयार करना किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। जुलाई अगस्त और सितम्बर में होने वाली भारी वर्षा से प्याज की नर्सरी खराब होने का खतरा रहता है, इससे समय पर पौध उपलब्ध नहीं हो पाती। ऐसे में गठिया तकनीक किसानों के लिए सरल, प्रभावी और उपयोगी विकल्प साबित हो सकती है。
गठिया तकनीक की प्रक्रिया
डॉ. सिंह ने बताया कि इस तकनीक में 15 जनवरी से 15 फरवरी के बीच प्याज के बीज को लगभग एक वर्ग मीटर क्षेत्र में 5 ग्राम की दर से बोया जाता है। इसकी देखभाल सामान्य प्याज नर्सरी की तरह की जाती है।
फसल प्रबंधन
अप्रैल-मई तक छोटे-छोटे प्याज के गठिया (बल्बलेट) तैयार हो जाते हैं, जिनका आकार लगभग 1.5 से 2.5 सेंटीमीटर होता है। इन्हें निकालकर अच्छी तरह सुखाने के बाद हवादार स्थान पर सुरक्षित रखा जाता है तथा स्वस्थ एवं उचित आकार की गठियों को रोपाई के लिए अलग कर लिया जाता है।
रोपाई की विधि
उन्होंने बताया कि बरसात के मौसम में खेत में 20 से 25 सेंटीमीटर ऊँची मेड़ अथवा उठी हुई क्यारियाँ तैयार कर गठियों की लगभग 20 × 10 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपाई की जाती है। रोपाई के बाद हल्की सिंचाई तथा आवश्यक फसल प्रबंधन किया जाता है। इस तकनीक से लगभग 65 से 70 दिनों में गुणवत्तायुक्त प्याज की फसल प्राप्त की जा सकती है।
किसानों के लिए लाभ
सब्जी विभागाध्यक्ष ने कहा कि भारी वर्षा के कारण जब सामान्य प्याज की नर्सरी प्रभावित होने की आशंका रहती है, तब गठिया तकनीक किसानों को खरीफ मौसम में भी प्याज उत्पादन का बेहतर विकल्प उपलब्ध कराती है। इससे प्याज का उत्पादन एवं उपलब्धता बढ़ाने के साथ किसानों की आमदनी में वृद्धि तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है।


