DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हंसमुख स्वभाव के चलते दुश्मनों के भी दोस्त थे सुशील सिद्धार्थ : मैत्रेयी पुष्पा

sushil siddharth

मशहूर व्यंग्यकार और किताब घर प्रकाशन के संपादक सुशील सिद्धार्थ का शनिवार को हार्ट अटैक से निधन हो गया। वे करीब 60 वर्ष के थे। सुशील सिद्धार्थ के आकस्मिक निधन से साहित्य प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है। सभी ने इसे साहित्य जगत के लिए अपूर्णीय क्षति बताया है। 

जानकारी के मुताबिक, दो जुलाई 1958 को सीतापुर के भीरागांव में जन्मे सुशील सिद्धार्थ अवधी हिन्दी के रचनाकार थे। शनिवार सुबह सुशील सिद्धार्थ की तबीयत बिगड़ी तो उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां उनका निधन हो गया। सुशील के निधन की खबर सुनकर पुरनिया स्थित उनके घर लोगों और साहित्यकारों का जमावड़ा लग गया।  

सुशील सिद्धार्थ ने व्यंग्य कविता और आलोचना के साथ किताब घर प्रकाशन का संपादन किया। उनकी प्रमुख कृतियां व्यंग्य संग्रह प्रीति न करियो कोय, नारद की चिंता, मालिश महापुराण साहित्य प्रेमियों के बीच काफी चर्चित रहे। उन्हें साहित्यिक योगदान के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से दो बार व्यंग्य, दो बार अवधी कविता के लिए नामित पुरस्कार और आलोचना के लिए स्पंदन सम्मान से नवाजा गया।

सुशील की प्रतिभा का सही उपयोग नहीं हो सका

मैत्रेयी पुष्पा के साथ सुशील सिद्धार्थ

सुशील सुशील सिद्धार्थ के निधन पर शोक व्यक्त कर उन्हें याद करते हुए लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि कल एक ऐसे रचनाकार का निधन हुआ है जो व्यंग्य विधा के धनी थे। उनके आकस्मिक निधन की खबर सुनकर हम स्तब्ध हैं। उन्होंने कहा कि रचनाकार तो साहित्य जगत में बहुत होते हैं, लेकिन ज्यादातर के अपने-अपने गुट होते हैं। लेकिन सुशील ऐसे व्यक्ति या रचनाकार थे जिनके शत्रु आपको ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे। क्योंकि वो शत्रुओं से भी मित्रता से पेश आते थे। वह एक बेहद हंसमुख इंसान थे, अगर कोई पीठ पीछे उनकी बुराई भी करता था तो वो उसे अनदेखा कर देते थे, लेकिन वह खुद किसी की निंदा नहीं करते थे।

मैत्रेयी पुष्पा ने कहा, मेरा मानना है कि सुशील की प्रतिभा का सही उपयोग नहीं हो सका। वो साहित्य के हर क्षेत्र में अत्यंत प्रतिभाशील व्यक्ति थे। वो व्यंग्य विधा को अपनी विधा मानकर चलते थे, जिसमें उनका मुकाबला करना किसी के लिए भी मुश्किल था। 

मैत्रेयी पुष्पा और अन्य लोगों के साथ सुशील सिद्धार्थ

उन्होंने बताया कि हिंदी अकादमी की पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती जब से मासिक रूप से हुई तब से ही वो उसके साथ जुड़े हुए थे और उनका कॉलम कटाक्ष सबसे ज्यादा पढ़ा जाता था। उनको पत्रिका में रखना पत्रिका और पाठकों के लिए अनिवार्य जैसा हो गया था। जितना उन्हें ज्ञान था, वो हर किसी में नहीं होता। राजेंद्र यादव के जाने के बाद मैं साहित्य और उपन्यास के बारे में उनसे ही चर्चा करती थी क्योंकि मैं गांव पर लिखती रही हूं और उन्हें गांवों की काफी जानकारी थी, इसलिए मैं जब उनसे कुछ पूछती थी तो वह उम्र में बड़ी होने के चलते मुझसे सदैव संयमित लहजे में ही बात करते थे।

मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि उन्हें याद है कि सुशील सिद्धार्थ ने जिन भी प्रकाशनों में नौकरी की उन्होंने उनके आर्थिक अभाव को भुनाया। कुछ ने प्रकाशन के भीतर साजिश करके उन्हें हटाया, अब वो किताब घर में थे। किताब घर में उनकी योग्यता को देखा, परखा और माना और समुचित सम्मान भी दिया।

मुझे यह देखकर खुशी होती थी कि देर से ही सही लेकिन अब वह एक सही जगह पर पहुंच गए हैं। लेकिन एक सही जगह पर सुशील बहुत दिन नहीं रह सके और अंतत: दुनिया से चले गए।
 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:famous Writer sushil siddharth was everbodys friend says maitreyi pushpa