एआई के दौर में लोकतंत्र पर महामंथन, देश-विदेश के विशेषज्ञ जुटे
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के जिम्मेदार इस्तेमाल पर विशेषज्ञों ने मंथन किया। भारत में ‘एआई फॉर डेमोक्रेसी’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय समिट आयोजित किया गया। एआई को मानव क्षमता के विस्तार का माध्यम बनाना चाहिए। तकनीकी विकास के साथ सामाजिक चुनौतियों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते प्रभाव के बीच इसके जिम्मेदार इस्तेमाल पर विशेषज्ञों ने मंथन किया। मंगलवार को देव संस्कृति विश्वविद्यालय (देसंविवि) में ‘एआई फॉर डेमोक्रेसी’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय समिट आयोजित किया गया। देश-विदेश से पहुंचे विशेषज्ञों ने लोकतांत्रिक मूल्यों और मानव हितों को सुरक्षित रखने पर विचार रखे। इस दौरान एआई आधारित पत्रिका समेत कई पुस्तकों का विमोचन किया गया। विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को सम्मानित भी किया गया। समिट की अध्यक्षता करते हुए देसंविवि के उपाध्यक्ष डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा तकनीकी विकास को हमेशा मानव कल्याण से जोड़कर देखती रही है। एआई को मानव बुद्धि का विकल्प नहीं, बल्कि मानव क्षमता के विस्तार का माध्यम बनाना होगा। मानवीय मूल्यों से जुड़ा एआई लोकतंत्र को अधिक संवेदनशील, समावेशी और जनकेंद्रित बना सकता है。
समिट के उद्देश्यों
लंदन स्थित सेंटर फॉर टुमॉरो के संस्थापक अध्यक्ष डेक्स हंटर-टोरिक ने कहा कि एआई का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचना चाहिए। इसके लिए तकनीकी विकास के साथ सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों पर भी ध्यान देना जरूरी है। सरकार, उद्योग और समुदाय को मिलकर ऐसी तैयारी करनी होगी, जिससे एआई समान अवसर, मानव कल्याण और समावेशी विकास का आधार बन सके।
विशेषज्ञों के विचार
समिट में एआई और लोकतांत्रिक संस्थाओं के संबंध, सार्वजनिक नीति, नागरिक भागीदारी, डिजिटल विश्वसनीयता और भविष्य की शासन व्यवस्था पर विशेषज्ञों ने विचार रखे। कार्यक्रम में द ब्रिटिश यूनिवर्सिटी इन इजिप्ट के डीन प्रोफेसर इब्राहिम सलामा, कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक, ब्रिटिश हाई कमीशन नई दिल्ली के टेक पॉलिसी प्रमुख हैरी फिशर, स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. विजय धस्माना और मनु गौड़ समेत देश-विदेश के विशेषज्ञ मौजूद रहे।


