इंजीनियर आयुष ने पिता को लीवर दान कर दी नई जिंदगी
12 जुलाई 2019 को इंजीनियर आयुष ने अपने पिता को लीवर दान देकर उनकी जिंदगी बचाई। ऑपरेशन के बाद पिता पप्पू सिंह अब सामान्य जीवन जी रहे हैं। दूसरी कहानी में दृष्टिहीन अजय कुमार ने कॉर्निया ट्रांसप्लांट से 15 साल बाद अपनी रोशनी वापस पाई।

12 जुलाई 2019 को इंजीनियर आयुष अपना 18वां जन्मदिन मना रहे थे। तभी पता चला कि उनके पिता पप्पू सिंह लीवर सिरोसिस से जूझ रहे हैं और लीवर ट्रांसप्लांट ही उन्हें बचा सकता है। आयुष ने तत्काल पिता को लीवर दान करने का फैसला लिया और बेंगलुरु पहुंच गए। जांच में उपयुक्त पाए जाने और झारखंड-कर्नाटक सरकार की अनुमति के बाद पिता-पुत्र का ऑपरेशन हुआ। दोनों करीब एक महीने अस्पताल में रहे। इस दौरान पिता को चार बार हार्ट अटैक भी आया, लेकिन इलाज के बाद वह बच गए। आज 60 वर्षीय पप्पू सिंह सामान्य जीवन जीते हुए व्यवसाय कर रहे हैं। आयुष भी पूरी तरह स्वस्थ हैं और इंजीनियरिंग के बाद बेंगलुरु में मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रहे हैं।
अन्य प्रेरणादायक कहानियां
पप्पू ने बताया कि उनकी बहन और बेटी लीवर दान करना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने बेटे से ही लीवर लेने का फैसला किया। नई जिंदगी मिलने के बाद पप्पू सिंह और उनकी पत्नी ने मृत्यु के बाद शरीर दान करने का संकल्प लिया है। पप्पू सिंह ने बताया कि लीवर ट्रांसप्लांट ही ऐसा अंगदान है, जिसमें दानकर्ता के लीवर का बचा हुआ हिस्सा करीब 20 दिन बाद फिर से विकसित होकर उतना ही हो जाता है।
दूसरे की आंख से 15 साल बाद लौटी रोशनी
अजय कुमार बचपन में बीमारी के कारण दृष्टिहीन हो गए थे। करीब 15 साल बाद 2012 में उन्हें दाता का कॉर्निया मिला और ट्रांसप्लांट के बाद उनकी आंखों की रोशनी लौट आई। इसके बाद उन्होंने इंटरमीडिएट, ग्रेजुएशन और मेडिकल कोर्स किया। आज वह एक अस्पताल में हेड पैथोलॉजिस्ट हैं।
नेत्रदान की स्थिति
वहीं, चांडिल के किसान अंबुज की भी आंखों की रोशनी चली गई थी, जो बाद में कॉर्निया ट्रांसप्लांट के बाद वापस आ गई। अभी जमशेदपुर आई अस्पताल में आई बैंक तो नहीं है, लेकिन वहां कॉर्निया ट्रांसप्लांट की सुविधा है। 2025-26 में यहां 15 लोगों को कॉर्निया लगाया गया था।
नेत्रदान के आंकड़े
जमशेदपुर में 1994 से अब तक 162 लोगों की मृत्यु के बाद परिजनों ने नेत्रदान किया है। कुछ लोगों ने पहले ही नेत्रदान की सहमति दी थी, जबकि कई मामलों में परिजनों ने मृत्यु के बाद निर्णय लिया। हर साल औसतन पांच नेत्रदान से करीब 10 लोगों की जिंदगी रोशन होती है। हालांकि, नेत्रदान बढ़ने के बावजूद शहर में कॉर्निया ट्रांसप्लांट की व्यवस्था अब तक नहीं हो सकी है। सिर्फ भारतीय ही नहीं, बल्कि नेपाल के अर्जुन बुड्डा का भी यहां कॉर्निया ट्रांसप्लांट हुआ था.


