DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

केसों का पहाड़ खत्म करने के लिए 8500 जजों की दरकार, अदालतों में छुट्टियां घटाने का सुझाव

संसद में गुरुवार को वित्त वर्ष 2018-19 के आर्थिक समीक्षा में देश की अदालतों में जजों की कमी के कारण लंबित तीन करोड़ केसों पर चिंता जताई गई। समीक्षा में कहा गया कि पांच सालों में देश में केसों का प्रतीक्षा अवधि समाप्त करने के लिए 8,519 जजों की जरूरत है। इससे एक वर्ष पहले पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने केसों के प्रतीक्षा अवधि पर चिंता व्यक्त की थी और उन्होंने कहा था कि देश में 3.3 करोड़ केस लंबित हैं। लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 3.53 करोड़ (1 जुलाई 2019) हो गई है।

वहीं हाइकोर्ट और निचली अदालतों में जजों की 5,535 रिक्तियां हैं। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि सुप्रीम कोर्ट में एक भी रिक्ति नहीं है और यहां जजों की सभी 31 पद भरे हुए हैं। यहां 58,000 से ज्यादा केस लंबित हैं। लेकिन समीक्षा में कहा गया है कि केसों के इस प्रतीक्षा अवधि से निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में छह भी अतिरिक्त जजों की जरूरत है।

आर्थिक सर्वे ने बताया मोदी सरकार का रोडमैप, ऐसे बनेगा भारत 5000 अरब डॉलर की अर्थव्यस्था 

देश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ऐसा कोर्ट है जिसमें सबसे ज्यादा 7,30,305 मुकदमे लंबित हैं। वहीं निचली अदालतों में लंबित केसों में भी उत्तर प्रदेश 74,78,043 केस लेकर सबसे आगे है। महाराष्ट्र में 37,01,785, प. बंगाल 22,71,075, बिहार 27,17,093 तथा गुजरात में 16,97,814 केस लंबित हैं। समीक्षा में कहा गया है कि 10 राज्य यूपी, बिहार, मप्र, गुजरात, दिल्ली, तमिलनाड़, कर्नाटक, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि में जजों की सबसे ज्यादा 3978 (78 फीसदी) रिक्तियां है।

अदालतों में छुट्टियां घटाने का सुझाव
आर्थिक सर्वे में न्यायपालिका की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अदालतों में छुट्टियां घटाने तथा और न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का सुझाव दिया गया है। साथ ही निचली अदालतों पर भी ज्यादा ध्यान देने की जरूरत बताई गई है। इसके साथ ही सर्वे में कहा गया है कि अनुबंध को लागू करने में विलंब और विवादों के समाधान में देरी भारत में कारोबार सुगमता (ईज आफ डूइंग बिजनेस) में अदालतों में देरी बहुत बड़ी बाधा हैं।

आर्थिक सर्वे: प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिये ऊर्जा खपत में ढ़ाई गुना वृद्धि की जरूरत

सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट में काम के दिन बढ़ाने से नहीं होगा फायदा
अदालतों में काम के दिवस बढ़ाने पर सर्वे में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट साल में 190 दिन, हाईकोर्ट 232 दिन तथा निचली अदालतें 244 दिन काम करती हैं। निचली कोर्ट सरकारी दफ्तरों की तरह हैं। लेकिन यदि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में कार्यदिवस बढ़ाए जाएंगे तो इससे इन अदालतों की उत्पादकता तो बढ़ेगी, लेकिन इसका निचली अदालतों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि निचली अदालतों में ही सबसे ज्यादा केस लंबित हैं और वे सरकारी कार्यालयों की तरह से ही खुलती हैं।  

यूपी, बिहार पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत
संसद में पेश किए गए 2019-20 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार अदालतों में लंबित ज्यादातर मामले जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में हैं। वहीं यूपी, बिहार और ओडिशा ऐसे राज्य हैं जिनपर ज्यादा देने की जरूरत है। सर्वे में कहा गया है, अनुबंधों को लागू करने की व्यवस्था में तेजी लाने और उसे सुधारने के लिए कई कदम उठाने के बावजूद देरी और न्यायालयों में मामलों के लंबित होने का आर्थिक गतिविधि पर असर पड़ रहा है। अनुबंधों का क्रियान्वयन हमारी कारोबार सुगमता रैकिंग के सुधार के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है। भारत अनुबंधों को लागू करने के संकेतक पर लगातार पीछे चल रहा है और 2018 की नवीनतम कारोबार सुगमता रैंकिंग में वह 164 से महज एक रैंक सुधरकर 163 पर आया। 

कोर्ट के प्रशासन की सेवा बने
सर्वे में कहा गया है कि जजों के प्रशासिनक काम करने से कारण उनकी न्यायिक क्षमताएं प्रभावित होती हैं। यदि उनके लिए कोर्ट के प्रशासन सेवा का गठन कर दिया जाए इससे जजों का न्यायिक समय बचेगा। ऐसी सेवाए कई देशों अमेरिका, यूके और कनाडा में हैं। 

कहां कितने मामले लंबित
सुप्रीम कोर्ट : 58,000 केस लंबित, अतिरिक्त जजों की जरूरत : 6
हाईकोर्ट :43,63,260 केस लंबित, अतिरिक्त जजों की जरूरत : 361 
निचली कोर्ट:  3.04 करोड़ केस लंबित, अतिरिक्त जजों की जरूरत : 8152
कुल लंबित केस 3.5 करोड़ से ज्यादा

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Economic survey 2019 3 Crore Cases Pending in Court Needs 8500 Judge