वेंटिलेटर से न संभले सांसों का संकट तो ईसीएमओ आखिरी सहारा
जब सांस की गंभीर बीमारी में वेंटिलेटर से भी ऑक्सीजन नहीं मिलती, तब ईसीएमओ एक जीवन रक्षक तकनीक है। लोहिया संस्थान के कार्यशाला में बताया गया कि ईसीएमओ मशीन के माध्यम से रक्त में ऑक्सीजन मिलाकर फेफड़ों को आराम देती है। विशेषज्ञों की देखरेख में इसका उपयोग किया जाता है।

सांस की गंभीर बीमारी में जब वेंटिलेटर से भी पर्याप्त ऑक्सीजन न मिले, तब ईसीएमओ (एक्स्ट्राकॉरपोरियल मेम्ब्रेन ऑक्सीजनेशन) जीवन रक्षक तकनीक बनती है। लोहिया संस्थान के एनेस्थीसिया विभाग में आयोजित कार्यशाला में विभागाध्यक्ष डॉ. पीके दास ने बताया कि ईसीएमओ यानी एक्स्ट्राकॉरपोरियल मेम्ब्रेन ऑक्सीजनेशन में मरीज के शरीर से खून एक मशीन में भेजा जाता है। मशीन खून में ऑक्सीजन मिलाती है। कार्बन डाईऑक्साइड बाहर निकालती है। इसके बाद साफ और ऑक्सीजन वाला खून वापस शरीर में पहुंचाया जाता है। इस तरह कुछ समय के लिए मशीन फेफड़ों का काम संभालती है। किन मरीजों को जरूरत पड़ती है?
किन मरीजों को जरूरत पड़ती है?
संस्थान के निदेशक डॉ. सीएम सिंह ने कहा कि ईसीएमओ हर मरीज के लिए नहीं होती। आमतौर पर उन मरीजों में इसका इस्तेमाल किया जाता है, जिनके फेफड़े या दिल गंभीर रूप से काम करना बंद करने की स्थिति में पहुंच गए हों। वेंटिलेटर, दवाओं या अन्य इलाज से पर्याप्त फायदा न हो रहा हो। गंभीर निमोनिया, एआरडीएस, फेफड़ों की अचानक विफलता, कुछ मामलों में गंभीर हार्ट फेल्योर या कार्डियक शॉक जैसे मरीजों में डॉक्टर ईसीएमओ पर विचार करते हैं।
अंगों को मिलता है संभलने का समय
संस्थान के पूर्व निदेशक व एनस्थीसिया विभाग के अध्यक्ष डॉ. दीपक मालवीय ने बताया कि ईसीएमओ बीमारी को सीधे ठीक नहीं करती, बल्कि लेकिन शरीर को जरूरी ऑक्सीजन पहुंचाकर फेफड़ों व दिल को आराम देकर डॉक्टरों को मूल बीमारी के इलाज का समय देती है। सुधार होने पर मशीन का सपोर्ट धीरे-धीरे कम कर दिया जाता है। संक्रमण, ब्लीडिंग और थक्का बनने के जोखिम के कारण इसे विशेषज्ञों की देखरेख में आईसीयू में ही इस्तेमाल किया जाता है। कार्यक्रम में कुलसचिव डॉ. सुब्रत चन्द्रा, कॉर्डियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. भुवन चन्द्र तिवारी, डॉ. आशीष झा, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अरविंद सिंह समेत अन्य डॉक्टर मौजूद रहे। इस मौके पर वर्ष 2017 में एक मरीज को ईसीएमओ की मदद से जान बचाई गई। विभागाध्यक्ष ने मरीज को मंच पर बुलाया। मरीज ने अनुभव साझा किया।


