संथाली भाषा व अकादमिक शोध के क्षेत्र में योगदान दे रही हैं डॉ. डूमनी माई मुर्मू
डॉ. डूमनी माई मुर्मू झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले की निवासी हैं। वे सहायक प्राध्यापक हैं और संथाली भाषा एवं ओलचिकी लिपि के क्षेत्र में विशेष योगदान दे रही हैं। उन्होंने भारत का पहला ओलचिकी राजनीतिक मानचित्र तैयार किया, जो राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण उपलब्धि है। मुख्यमंत्री ने उनकी कोशिशों की सराहना की है।

चक्रधरपुर। डॉ. डूमनी माई मुर्मू झारखंड के कोल्हान प्रमंडल के सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड स्थित गिधी झुरी गांव की निवासी हैं। वे वर्तमान में झारखंड में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं तथा संथाली भाषा, ओलचिकी लिपि, आदिवासी साहित्य, संस्कृति एवं अकादमिक शोध के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रही हैं। उन्होंने ओलचिकी लिपि के क्षेत्र में ऐतिहासिक एवं अभिनव उपलब्धि हासिल करते हुए भारत का प्रथम ओलचिकी राजनीतिक मानचित्र तैयार किया। यह कार्य केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का विषय है। इस उपलब्धि ने ओलचिकी लिपि को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान प्रदान की।
संथाली भाषा, आदिवासी संस्कृति और भाषाई विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा। इस ऐतिहासिक योगदान की सराहना झारखंड के मुख्यमंत्री द्वारा की गई। इसे राज्य और समाज के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया गया।डॉ. डूमनी माई मुर्मू ने यह सिद्ध किया है कि दृढ़ संकल्प, सतत परिश्रम, समर्पण और दूरदर्शी सोच के बल पर राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। आज डॉ. डूमनी माई मुर्मू का व्यक्तित्व शिक्षा, शोध, भाषा-संरक्षण और सांस्कृतिक जागरूकता का प्रतीक बन चुका है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि अपनी मातृभाषा, लिपि और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ आधुनिक तकनीक, नवाचार और ज्ञान-विज्ञान का समन्वय कर समाज तथा राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण, विद्वत्ता और सामाजिक उत्तरदायित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहेगा।


