अतिक्रमण से पहले चौकसी : नालंदा की 335 हेक्टेयर में फैली 44 आर्द्रभूमियों का होगा डिजिटल सर्वेक्षण सेव वेटलैंड ऐप से रखी जाएगी कार्यों पर सीधी निगरानी, राजगीर से बिहारशरीफ तक फैला वेटलैंड नेटवर्क 335.80 हेक्टेयर आर्द्रभूमि पर वन प्रमंडल की नजर, स्थल सत्यापन कर तैयार होगा डिजिटल बेसलाइन फोटो : भतहर पौंड : भतहर का तालाब। बिहारशरीफ, कार्यालय संवाददाता। प्राकृतिक जल संपदा के संरक्षण को लेकर नालंदा वन प्रमंडल ने बड़ा कदम उठाया है। जिले की 44 प्रमुख आर्द्रभूमियों (वेटलैंड) की ग्राउंड-ट्रुथिंग यानी स्थल सत्यापन का कार्य शुरू कर दिया गया है। पहले चरण में चयनित इन आर्द्रभूमियों का कुल क्षेत्रफल करीब 335.80 हेक्टेयर है। ये आर्द्रभूमि राजगीर, इस्लामपुर, सिलाव, नूरसराय, एकंगरसराय, अस्थावां, हरनौत, हिलसा, बिहारशरीफ सहित जिले के विभिन्न प्रखंडों में फैली हैं। इस कार्य में वन विभाग ‘सेव वेटलैंड’ ऐप की मदद ले रहा है। इसके जरिए हर आर्द्रभूमि की वास्तविक स्थिति, क्षेत्रफल और अन्य स्थल संबंधी जानकारी डिजिटल रूप से दर्ज की जा रही है। इससे एक फील्ड-वेरिफाइड डिजिटल आधार तैयार होगा। इसके सहारे भविष्य में इन आर्द्रभूमियों के स्वरूप में होने वाले किसी भी बदलाव पर तुरंत नजर रखी जा सकेगी।
जलमार्ग में बदलाव का खतरा
सिर्फ जलाशय नहीं, पूरा हाइड्रोलॉजिकल तंत्र है दांव पर : वन प्रमंडल ने स्पष्ट किया है कि आर्द्रभूमियां केवल जल संचयन का स्थान नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण जलवैज्ञानिक व पारिस्थितिक तंत्र हैं। इनका प्राकृतिक जलागम क्षेत्र जल के आवक-निकास मार्ग तथा आसपास की भूमि से जुड़ाव इनके अस्तित्व के लिए अत्यंत जरूरी है। हालांकि, इन आर्द्रभूमियों का स्वामित्व मुख्यतः राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग तथा जल संसाधन विभाग से जुड़ा है। लेकिन, कृषि विस्तार, आवासीय व व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ते दबाव के कारण इन क्षेत्रों में अतिक्रमण की आशंका लगातार बनी रहती है।
ग्राउंड-ट्रुथिंग की महत्वता
सिर्फ कब्जा नहीं, जलमार्ग में बदलाव भी बड़ा खतरा : वन विभाग के अनुसार सिर्फ आर्द्रभूमि के जलक्षेत्र पर सीधा अतिक्रमण ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक जल-आवक व निकास मार्गों में परिवर्तन, जलागम क्षेत्र में हस्तक्षेप तथा जल प्रवाह को बाधित करने वाली गतिविधियां भी पूरे हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकती हैं। यही वजह है कि ग्राउंड-ट्रुथिंग के जरिए हर आर्द्रभूमि की वास्तविक स्थिति व सीमा का बारीकी से दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। राजगीर क्षेत्र में सबसे ज्यादा आर्द्रभूमियां चिह्नित : चिह्नित सूची के अनुसार सबसे अधिक आर्द्रभूमियां राजगीर व इस्लामपुर प्रखंड क्षेत्र में हैं। इनमें उजरपुर की तीन आर्द्रभूमियां अकेले 67 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फैली हैं। इसके अलावा घोड़ाकटोरा (गिरियक), नगरी (सिलाव), बेगमपुर (नूरसराय) और बिहार शरीफ नगर निगम क्षेत्र की छह आर्द्रभूमियां भी इस सूची में शामिल हैं। 12 प्रखंडों के इन गांवों में स्थित तालाबों का होगा सर्वे : राजगीर के उजरपुर (3 तालाब, 67.56 हेक्टेयर), हंसराजपुर (3.52 हेक्टेयर) व पिलखी (2.99 हेक्टेयर), गिरियक के घोड़ाकटोरा (11.02 हे), पोखरपुर (13.57 हे), सिलाव के नगरी (26.59 हे), सूरजपुर (14.21 हे), बड़गांव (6.67 हे), इस्लामपुर के अकबरपुर (2.74 हे), पनहर (7.30 हे), कोबिल (13.41 हे), बेशवक (2.52 हे), बिहारशरीफ के तेतरावां (9.98 हे), तुंगी (3.81 हे), नौबतपुर लोटन (2.92 हे), बिहारनगर निगम क्षेत्र (6 तालाब-33.80 हे), नूरसराय के बेगमपुर (2 तालाब- 30.25 हे), मुस्तफापुर (3.65 हे), सरगांव (3.20 हे), कथमपुरा (6.48 हे), चंडासी (2.76 हे), एकंगरसराय के रसीसा (2.93 हे), सिरियावां (3.86 हे), बरसियावां (5.39 हे), राढ़िल (2.66 हे), सुल्तानपुर (3.87 हे), ओप (3.00 हे), अस्थावां के जिअर (17.92 हे), गिलानी (5.88 हे), अमावां (3.26 हे), परवलपुर के शंकरडीह (3.38 हे), रहुई के सिकंदरपुर (2.74 हे), हिलसा के कपसियावां (2.40 हे), हिलसा नगर पंचायत (3.03 हे), हरनौत के बस्ती (3.50 हे) व श्रीचंदपुर (3.03 हेक्टेयर)। अधिकारी बोले : आर्द्रभूमि केवल पानी से भरा क्षेत्र नहीं, बल्कि एक जीवंत जलवैज्ञानिक तंत्र है, जो जैव विविधता, कृषि और स्थानीय समुदायों को सहारा देती है। डिजिटल मॉनिटरिंग से भविष्य में होने वाले किसी भी बदलाव या अतिक्रमण को प्रारंभिक स्तर पर ही चिह्नित कर संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित किया जा सकेगा। राजकुमार मनमोहन, डीएफओ