नेपाल की चट्टानों ने रोकी चीन-भारत तक सीधी पहुंच
भारत, नेपाल और चीन को जोड़ने वाली त्रिदेशीय महाकाली कॉरिडोर सड़क के निर्माण में भौगोलिक और पर्यावरणीय बाधाओं के कारण देरी हो रही है। 413 किलोमीटर लंबे मार्ग का उद्देश्य त्रिदेशीय व्यापार बढ़ाना है, लेकिन केवल 80 किमी सड़क पूरी हुई है। निर्माण में बजट की कमी और स्थानीय विरोध भी चुनौतियाँ पेश कर रहे हैं।

हल्द्वानी, वरिष्ठ संवाददाता। भारत, नेपाल और चीन को जोड़ने वाली प्रस्तावित त्रिदेशीय सड़क के निर्माण में भीषण भौगोलिक बाधाओं के कारण देरी हो रही है। नेपाल के कंचनपुर से चीन सीमा के तिनकर तक बनने वाली इस महाकाली कॉरिडोर सड़क को पहाड़ों की दुर्गम चट्टानों, बजट की कमी और पर्यावरणीय विरोध ने रोक दिया है। उत्तराखंड की सीमाओं से होकर गुजरने वाले इस 413 किलोमीटर लंबे मार्ग का उद्देश्य त्रिदेशीय व्यापार को बढ़ावा देना और कैलास मानसरोवर यात्रा को सुगम बनाना है। हालांकि भौगोलिक कठिनाइयों और प्रशासनिक बाधाओं के कारण इस परियोजना की गति धीमी पड़ गई है। अभी तक 80 किमी ही सड़क पूरी बन पाई है。
ये हैं चुनौतियां
करीब 18 अरब रुपये की लागत से बनाए जा रहे इस कॉरिडोर के निर्माण में भीषण और विशाल चट्टानें सबसे बड़ा अवरोध बनी हुई हैं। बजट की कमी और पेड़ों की कटाई का स्थानीय स्तर पर होने वाला विरोध भी देरी के प्रमुख कारण हैं। इस वजह से करीब एक साल से काम रुका हुआ है। वहीं अधिकारियों का कहना है कि शीघ्र कार्य शुरू होगा।
ये होगी सहूलियत
इस सड़क के बनने से नेपाल, भारत और चीन के बीच व्यापारिक गतिविधियां तेज होंगी और परिवहन लागत में कमी आएगी। भारत के यात्रियों की कैलास मानसरोवर की यात्रा कम समय में पूरी होगी। यह मार्ग चम्पावत जिले के सीमावर्ती इलाकों के साथ पिथौरागढ़ के दार्चुला के किनारे से होकर गुजरेगा। ऐसे में यह मार्ग तीनों देशों के बीच सामरिक संपर्क और आवाजाही को मजबूत करेगा।
कोट:
महाकाली कॉरिडोर पर कराड़ों की लागत से काम हो रहा है। परियोजना के पूरा होने से चीन और भारत को भी व्यापारिक लाभ मिलेगा। कुछ आपत्तियां हैं जिसका निस्तारण नेपाल सरकार की ओर से किया जा रहा है।
दिनेश रैखोल, इंजीनियर परियोजना, नेपाल


