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Hindi News देशसब कानून के मुताबिक हुआ, आर्टिकल 370 के फैसले पर बोले CJI चंद्रचूड़, अयोध्या केस पर भी बताई बड़ी बात

सब कानून के मुताबिक हुआ, आर्टिकल 370 के फैसले पर बोले CJI चंद्रचूड़, अयोध्या केस पर भी बताई बड़ी बात

आर्टिकल 370 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर आलोचनाओं से बचते हुए सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि जजों ने जो कुछ भी किया वह संविधान और कानून के मुताबिक किया। फैसला सर्वसम्मति से सुनाया गया।

सब कानून के मुताबिक हुआ, आर्टिकल 370 के फैसले पर बोले CJI चंद्रचूड़, अयोध्या केस पर भी बताई बड़ी बात
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Ankit Ojhaभाषा,नई दिल्लीMon, 01 Jan 2024 08:41 PM
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आर्टिकल 370 पर केंद्र सरकार के कदम को बरकरार रखने के फैसले पर किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए सोमवार को सीजेआई डीवाई  चंद्रचूड़ ने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि जज कोई भी निर्णय कानून और संविधान के अनुसार ही लेते हैं। बता दें कि साल 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटा दिया था। इसके बाद सरकार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराया। 
     
सीजेआई ने  विशेष इंटरव्यू में कहा कि न्यायाधीश अपने निर्णय के माध्यम से अपनी बात कहते हैं जो फैसले के बाद सार्वजनिक संपत्ति बन जाती है और एक स्वतंत्र समाज में लोग हमेशा इसके बारे में अपनी राय बना सकते हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ''जहां तक ​​हमारा सवाल है तो हम संविधान और कानून के मुताबिक फैसला करते हैं। मुझे नहीं लगता कि मेरे लिए आलोचना का जवाब देना या अपने फैसले का बचाव करना उचित होगा। हमने इस संबंध में जो बात कही है वह हस्ताक्षरित फैसले में भी दिखाई देती है।''
     
आर्टिकल 370 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर एक पूर्व न्यायाधीश समेत कुछ न्यायविदों द्वारा हाल में की गई आलोचनाओं को लेकर पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने यह प्रतिक्रिया दी। उच्चतम न्यायालय ने 11 दिसंबर को पूर्ववर्ती राज्य जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने के 2019 के फैसले को सर्वसम्मति से बरकरार रखा था। न्यायालय ने 30 सितंबर, 2024 तक जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव कराने का आदेश देते हुए कहा था कि उसका राज्य का दर्जा “जल्द से जल्द” बहाल किया जाए।
     
 यह मानते हुए कि 1947 में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए भारतीय संविधान में शामिल किया गया अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था, प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा था कि भारत के राष्ट्रपति को तत्कालीन राज्य की संविधान सभा की गैर मौजूदगी में इस उपाय को रद्द करने का अधिकार था, जिसका कार्यकाल 1957 में समाप्त हो गया था।
    
सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, ''किसी मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश अपने निर्णय के माध्यम से अपनी बात रखते हैं। एक बार निर्णय सुनाए जाने के बाद वह निर्णय देश की सार्वजनिक संपत्ति बन जाता है। जब तक कोई फैसला नहीं सुनाया जाता तब तक प्रक्रिया उन न्यायाधीशों तक ही सीमित रहती है जो उस मामले के फैसले में शामिल होते हैं। एक बार जब हम किसी निर्णय पर पहुंच जाते हैं और फैसला सुना दिया जाता है तो यह सार्वजनिक संपत्ति है। यह राष्ट्र की संपत्ति है। हम एक स्वतंत्र समाज हैं।''
    
उन्होंने कहा, 'हमारे पास एक संविधान है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। इसलिए लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने के हकदार हैं।' शीर्ष अदालत ने पूर्ववर्ती राज्य जम्मू-कश्मीर से अलग कर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के केंद्र के फैसले की वैधता को भी बरकरार रखा था।

अयोध्या के फैसले पर क्या बोले सीजेआई
अयोध्या मामले में उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक के चार साल से अधिक समय बाद प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने सोमवार को कहा कि अयोध्या में विवादित स्थल पर एक ट्रस्ट द्वारा राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में निर्णय सुनाने वाले पांच न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया था कि इसमें फैसला लिखने वाले किसी न्यायाधीश के नाम का उल्लेख नहीं किया जाएगा।
    
 नौ नवंबर, 2019 को, एक सदी से भी अधिक समय से चले आ रहे एक विवादास्पद मुद्दे का निपटारा करते हुए तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया था और अयोध्या में मस्जिद के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि देने का भी निर्णय  सुनाया था।
     
इस संबंध में फैसला सुनाने वाली पीठ का हिस्सा रहे जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जब पांच न्यायाधीशों की पीठ फैसले पर विचार-विमर्श करने के लिए बैठी, जैसा कि हम सभी निर्णय सुनाए जाने से पहले करते हैं, तो हम सभी ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि यह अदालत का फैसला होगा। और, इसलिए, फैसले लिखने वाले किसी भी न्यायाधीश के नाम का उल्लेख नहीं किया गया।''