कुसंग से नष्ट होता है विवेक, सत्संग से मिलता सही मार्ग
जीयर स्वामी जी ने चातुर्मास महोत्सव में कहा कि कुसंग से विवेक नष्ट होता है जबकि सत्संग से सही मार्ग मिलता है। उन्होंने राजा परीक्षित की कथा के माध्यम से बताया कि अधर्म और गलत प्रवृत्तियों का साथ व्यक्ति और समाज के लिए हानिकारक होता है। श्रद्धालुओं को ईमानदारी और परिश्रम से धन अर्जित करने की सलाह दी गई।

कुसंग से नष्ट होता है विवेक, सत्संग से मिलता सही मार्ग जीयर स्वामी जी बोले- धर्म और सदाचार ही जीवन का सत्य मार्ग है चातुर्मास महोत्सव में राजा परीक्षित प्रसंग से श्रद्धालुओं को दिया संदेशभभुआ, नगर संवाददाता। सदर प्रखंड के परसिया गांव में चल रहे चातुर्मास महायज्ञ में श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने प्रवचन करते हुए कहा कि मनुष्य जैसा संग करता है, वैसा ही उसके जीवन पर प्रभाव पड़ता है। कुसंगति व्यक्ति के विवेक को नष्ट कर देती है, जबकि सत्संग उसे धर्म और सदाचार के मार्ग पर ले जाता है। गलत प्रवृत्ति के लोगों का साथ देना अथवा उन्हें संरक्षण देना अंतत: व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए घातक साबित होता है।
राजा परीक्षित की कथा
उन्होंने श्रीमद्भागवत महापुराण के राजा परीक्षित प्रसंग का वर्णन किया और कहा कि राजा परीक्षित ने जब कलियुग को अपने राज्य में रहने का स्थान दिया और उसके प्रभाव में आए, तब उनके मन में चंचलता और विकार उत्पन्न होने लगे। इसी मानसिक परिवर्तन के कारण वह शिकार करने के लिए वन में गए और वहां हुई घटना के बाद शृंगी ऋषि के शाप के भागी बने। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि जीवन में अधर्म और गलत प्रवृत्तियों को जगह मिलते ही विवेक कमजोर होने लगता है। जीयर स्वामी जी ने कहा कि विषधर सर्प की मणि प्रकाश देती है, लेकिन उसके डसने से मृत्यु हो जाती है। उसी प्रकार गलत व्यक्ति, गलत साधन और अनैतिक तरीके से प्राप्त लाभ बाहर से आकर्षक दिखाई दे सकता है, लेकिन उसका परिणाम हमेशा विनाशकारी होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से ईमानदारी और परिश्रम के साथ धर्मसम्मत तरीके से धन अर्जित करने की बात कही। उन्होंने कहा कि भगवान की सत्ता पूरी सृष्टि में व्याप्त है, लेकिन मंदिरों में पूजा, आरती, भजन-कीर्तन और भगवान का निरंतर स्मरण होने के कारण वहां मन को विशेष शांति मिलती है।
योग का महत्व
चित्त की चंचलता रोकना ही वास्तविक योग योग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने का साधन नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा को अनुशासित करता है। उन्होंने धार्मिक और सांस्कृतिक मर्यादाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि अग्नि, गुरु, संत-महात्मा तथा माता-पिता के सामने पैर फैलाकर नहीं सोना चाहिए। यह भारतीय संस्कार और परंपरा के अनुरूप आचरण नहीं है।
कथा का शुभारंभ
आरती और प्रसाद का वितरण हुआ कथा के क्रम में उन्होंने बताया कि राजा परीक्षित ने अपने पुत्र जनमेजय का राज्याभिषेक कर राजपाट त्याग दिया और वन की ओर चले गए। वहां उनकी भेंट श्री शुकदेव जी महाराज से हुई। इसी दिव्य मिलन के बाद श्रीमद्भागवत महापुराण की पावन कथा का शुभारंभ हुआ, जो आज भी मानव जीवन को भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की राह दिखाती है। चातुर्मास महोत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। प्रवचन के दौरान पूरा पंडाल भक्ति और श्रद्धा से सराबोर रहा। अंत में आरती हुई और श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। कैप्शन- भभुआ प्रखंड के परसियां गांव के पास आयोजित चातुर्मास महोत्सव के दौरान प्रवचन करते जीयर स्वामी जी महाराज और कथा का श्रवण करते श्रद्धालु।


