उत्तर बिहार में बाढ़, नालंदा की 40 नदियों में उड़ रही धूल
उत्तर बिहार के नालंदा जिले में मानसून की बेरुखी से किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। जुलाई के मध्य तक जिले की 40 नदियों में पानी नहीं है, जिससे 1.47 लाख हेक्टेयर में धान की खेती प्रभावित हुई है। पिछले साल की तुलना में इस बार बारिश का स्तर भी काफी कम है।

पड़ताल उत्तर बिहार में बाढ़, नालंदा की 40 नदियों में उड़ रही धूल आधा जुलाई बीत गया पर एक भी नदी में नहीं बही धार मानसून की दगाबाजी से किसानों के हौसले हो रहे पस्त नदियों के बूते खेती करने की उम्मीद अबतक पूरी नहीं 1.47 लाख हेक्टेयर में धान की खेती किसानों के साथ विभाग के लिए चुनौती फोटो नदी - सूखी पड़ी पंचाने नदी। बिहारशरीफ, कार्यालय प्रतिनिधि। मानसून की दगाबाजी ने नालंदा के किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है। आधा जुलाई बीत चुका है, लेकिन जिले की छोटी-बड़ी 40 नदियों में पानी की एक बूंद तक नहीं है। विडंबना यह है कि उत्तर बिहार में जहां बाढ़ ने तबाही मचा रखी है, वहीं नालंदा की नदियों की सतह पर धूल उड़ रही है। पानी के अभाव में धनरोपनी की रफ्तार लगभग थम गई है, जिससे 1.47 लाख हेक्टेयर में धान की खेती का लक्ष्य किसानों और कृषि विभाग दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। सात दिन में सिर्फ एक फीसद रोपनी खेतों में दरारें पड़ने लगी हैं। थोड़ी राहत यह है कि किसानों ने शत-प्रतिशत धान का बिचड़ा (नर्सरी) तैयार कर लिया है। लेकिन, बिना पानी के खेत तैयार नहीं हो पा रहे हैं। हालात इतने खराब हैं कि पिछले सात दिनों में धनरोपनी में महज एक फीसद का ही इजाफा हुआ है। जिले में अब तक कुल 26 फीसद धान की रोपनी हो सकी है। पिछले साल बाढ़, इस साल पानी के लाले पिछले साल जुलाई के पहले पखवाड़े तक ही जिरायन, सकरी, गोइठवा, पंचाने, धनायन, लोकाइन और कुंभरी समेत सात नदियां लबालब हो गई थीं। 20 जून को लोकाइन में इतनी उफान थी कि करायपरसुराय, हिलसा और एकंगरसराय में तटबंध टूट गए थे। पूर्वी भाग के साथ अस्थावां, कतरीसराय और बिंद इलाके को बाढ़ की मार झेलनी पड़ी थी। लेकिन, इस बार नदियों में पानी का नामोनिशान नहीं है। उदेरा स्थान बराज सूखा, नलकूपों का सहारा: गया और जहानाबाद से होकर गुजरने वाली फल्गू नदी सूखी है। इसका नतीजा है कि उदेरा स्थान बराज से लोकाइन नदी में इस सीजन में अब तक एक बार भी पानी नहीं छोड़ा जा सका है। सरदार बिगहा के किसान धनंजय कुमार और नूरसराय के जगदीश प्रसाद बताते हैं कि जब नदियां भरी रहती थीं तो 80 फीसद खेतों की सिंचाई अपने आप हो जाती थी। अब बिचड़ा बचाने से लेकर रोपनी तक के लिए पूरी तरह बिजली और निजी मोटर पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिससे लागत काफी बढ़ गई है।


