सत्ता का नैतिक पतन ही विनाश की राह बनता है : कोर्ट
राउज एवेन्यू की विशेष सीबीआई अदालत ने IRCTC से जुड़े धनशोधन मामले में लालू प्रसाद यादव का आरोप तय करते हुए सत्ता के नैतिक पतन पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि अभियुक्तों के पास हाईकोर्ट में चुनौती देने का विकल्प है और आरोप तय होने का अर्थ महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया है।

राउज एवेन्यू की विशेष सीबीआई अदालत ने गुरुवार को दोपहर तीन बजे के बाद आदेश सुनाने से पहले कहा कि जब सत्ता अपने रास्ते से सभी पाबंदियों को हटा देती है, तो उसका नैतिक पतन ही अंततः उसके विनाश की राह बनता है। आईआरसीटीसी से जुड़े लारा प्रोजेक्ट धनशोधन मामले में विशेष जज विशाल गोगने की अदालत ने कवि रवींद्रनाथ टैगोर की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहा कि जब सत्ता अपनी राह को आसान बनाने के लिए अपने रास्ते से सभी पाबंदियों को हटा देती है, तो वह अनजाने में ही अपने विनाश की पटकथा लिख रही होती है। उसका नैतिक पतन हर दिन गहराता जाता है और आसानी का यही फिसलन भरा रास्ता उसके पतन का मार्ग बन जाता है। अदालत ने रेखांकित किया कि टैगोर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नैतिक मार्गदर्शक थे और उनके विचार भटकाव के समय में संबल प्रदान करते थे। कोर्ट को यह निर्धारित करना था कि क्या पूर्व रेल मंत्री लालू द्वारा परियोजनाओं को बेदाग दिखाने के लिए सत्ता के सभी अंकुश वास्तव में हटा दिए गए थे।
जांच की राजनीतिक प्रेरणा
अदालत ने लालू प्रसाद यादव के वकील द्वारा जांच को राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बताए जाने के तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच की प्रकृति, समय और दिशा से ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि यह शिकायत किसी राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि कुछ संदेहास्पद सौदे खुलेआम किए जाते हैं, जहां जनसेवा की परत सिर्फ पर्दा डालने का काम करती है। सीबीआई और पीएमएलए मामलों की विशेष अदालतें इसीलिए अस्तित्व में हैं ताकि ऐसे नकाबपोश और घुमावदार सौदों को पकड़ा जा सके, जो व्यक्तिगत लाभ के लिए जनता के विश्वास और सार्वजनिक संपत्तियों का सौदा करते हैं।
आरोपियों के पास मौजूद है यह विकल्प
आरोप तय होने के बाद आरोपी के पास हाईकोर्ट में चुनौती देने का विकल्प होता है। इस प्रक्रिया में आरोपी या उनका वकील आरोप तय करने के आदेश को रद्द करने या संशोधित करने के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं। इसका उद्देश्य यह साबित करना होता है कि आरोप तय करने का आदेश अवैध है। हाईकोर्ट इस आवेदन की समीक्षा करता है और यदि आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि पाई जाती है, तो उसे रद्द या सुधारने का निर्देश देता है। सोमवार को नेताओं के वकील मनिंदर सिंह ने भी कहा कि आरोप तय करने के आदेश की कॉपी मिलने के बाद, वे उसे हाईकोर्ट में चुनौती देंगे। कानून विशेषज्ञों के मुताबिक, आरोप तय होने के बाद भी व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है। अभी ट्रायल की कार्यवाही वास्तविक रूप में शुरू होगी। उक्त मामले में फिलहाल लालू व परिवार व अन्य आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया गया है, इसलिए वे चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं।
आरोप तय करने का यह होता है अर्थ
किसी आपराधिक मुकदमे में अदालत द्वारा आरोप तय करना एक अहम कानूनी प्रक्रिया होती है। जब जांच एजेंसी आरोपपत्र दाखिल करती है, तो अदालत उस पर उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों का अवलोकन करती है। यदि अदालत को यह प्रतीत होता है कि आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टा अपराध बनता है या उसके खिलाफ गंभीर संदेह है, तो वह आरोप तय करती है।
प्रमुख टाइमलाइन
-सात जुलाई, 2017- जांच एजेंसी सीबीआई ने लालू यादव समेत पांच लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की।
-अगस्त 2018- सीबीआई की प्राथमिकी के आधार पर ईडी ने दर्ज किया मामला और आरोपपत्र दाखिल
-17 सितंबर 2018- कोर्ट ने ईडी द्वारा दायर चार्जशीट पर लिया संज्ञान
-13 अक्तूबर 2025- सीबीआई से जुड़े मामले में आरोप तय के आदेश
-फरवरी 2026- ईडी से जुड़े मामले में दोनों पक्षों की दलीलों के बाद फैसला सुरक्षित
-फरवरी से सितंबर- कई बार आदेश को लेकर टली सुनवाई
-दस सितंबर 2026- लालू समेत नौ के खिलाफ आरोप तय, सात आरोपमुक्त


