बिना लिखित आधार बताए गिरफ्तारी संवैधानिक अधिकारों का हननः कोर्ट
पटियाला हाउस कोर्ट ने कस्टम से जुड़े मामले में कहा कि आरोपी की गिरफ्तारी के समय परिजनों को लिखित सूचना न देना उनके अधिकारों का उल्लंघन है। मयंक बागानी को एक लाख रुपये के निजी मुचलके पर तुरंत रिहा किया गया। कोर्ट ने मौखिक सूचना को पर्याप्त नहीं माना।

नई दिल्ली, कार्यालय संवाददाता। पटियाला हाउस कोर्ट ने कस्टम से जुड़े एक मामले में कानून व्यवस्था को लेकर फैसला सुनाया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी अरिदमन सिंह चीमा की अदालत ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करते समय उसके परिजनों को लिखित में गिरफ्तारी का आधार न देना उसके संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
मायंक बागानी का मामला
कोर्ट ने कस्टम विभाग की लापरवाही को आधार मानते हुए सवा चार करोड़ रुपये की लग्जरी घड़ी बिना घोषणा और सीमा शुल्क चुकाए भारत लाने के आरोपी मयंक बागानी को तुरंत हिरासत से रिहा करने का आदेश दे दिया। मामले के मुताबिक, आरोपी मयंक सिंगापुर से दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचा था। एयरपोर्ट पर जब वह ग्रीन चैनल पार कर रहा था, तभी कस्टम अधिकारियों ने उसे संदेह के आधार पर रोक लिया। तलाशी के दौरान उसके पास से ''रिचर्ड मिल आरएम35-03'' मॉडल की कीमती घड़ी बरामद हुई, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत लगभग 4.15 करोड़ रुपये आंकी गई। विभाग ने घड़ी को जब्त कर आरोपी के खिलाफ कस्टम अधिनियम की धारा 132 और 135 के तहत मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया था। आरोपी को कोर्ट में पेश कर 14 दिनों की न्यायिक हिरासत की मांग की। लेकिन बचाव पक्ष का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशानिर्देशों के बावजूद आरोपी के किसी भी परिजन या रिश्तेदार को गिरफ्तारी के कारणों की लिखित प्रति नहीं सौंपी गई, जिससे आरोपी की हिरासत अवैध हो जाती है। इसके जवाब में कस्टम विभाग के जांच अधिकारी ने तर्क दिया कि उन्होंने आरोपी के चचेरे भाई को फोन पर इसकी सूचना दे दी थी और जांच के इस प्रारंभिक चरण में इसे पर्याप्त माना जाना चाहिए।
कानूनी प्रक्रिया की अनुपालना
अदालत ने दोनों पक्षों की जिरह सुनने और अरेस्ट मेमो सहित मामले के रिकॉर्ड का गहन अध्ययन करने के बाद कस्टम विभाग के दावों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि सिर्फ फोन पर मौखिक सूचना दे देना कानून की नजर में पर्याप्त नहीं है। विभाग की चूक का लाभ देते हुए अदालत ने आरोपी मयंक बागानी को एक लाख रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर सशर्त तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।


