जून में चार दिन ही खुले स्कूल और ले रहे पूरे महीने की परीक्षा
गर्मी की छुट्टियों के बाद झारखंड के सरकारी स्कूलों में छात्रों को बिन पढ़े परीक्षा में बैठने के लिए मजबूर किया गया। शिक्षा विभाग के निर्देश पर आयोजित मासिक परीक्षा के समय को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। शिक्षक और अभिभावक इस निर्णय से नाराज हैं।

गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल लौटते ही बच्चों को बिन पढ़े परीक्षा में बैठना पड़ा। शिक्षा विभाग के आदेश पर स्कूलों में रेल प्रोजेक्ट के तहत मासिक परीक्षा का आयोजन तो शुरू कर दिया गया है, लेकिन इसकी टाइमिंग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जून में गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुले चार दिन ही हुए थे और सीधे पूरे महीने के पाठ्यक्रम की परीक्षा ले ली गई। हैरानी की बात यह है कि मई में भी गर्मी की छुट्टियां थीं, जिसके कारण उस दौरान भी स्कूलों में पढ़ाई नहीं हो सकी थी। ऐसे में बिना लेसन प्लान पूरा हुए और बिना किसी ठोस पढ़ाई के सीधे परीक्षा में बैठने को मजबूर बच्चे इस व्यवस्था पर कड़ी आपत्ति जता रहे हैं। गर्मी छुट्टी के बाद 11 जून को स्कूल खुले थे और रेल परीक्षा 15-16 को आयोजित की गई।
अव्यवहारिक फैसला
इस अव्यावहारिक फैसले से न सिर्फ छात्र और उनके अभिभावक परेशान हैं, बल्कि खुद शिक्षक भी नाराज हैं। प्राथमिक स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि कक्षा चार और पांच के प्रश्नपत्रों में जून महीने का पाठ्यक्रम शामिल कर दिया गया है। कायदे से अप्रैल में हुई पढ़ाई का टेस्ट मई में और मई की पढ़ाई का टेस्ट जून में होना चाहिए था, लेकिन यहां बिना पढ़ाए ही परीक्षा थोप दी गई है। शिक्षकों का दर्द यह भी है कि यदि यही स्थिति किसी बड़ी कक्षा में होती तो अबतक भारी हंगामा और वॉकआउट हो चुका होता, लेकिन छोटे बच्चे चुपचाप इस अव्यवस्था को झेलने को मजबूर हैं। जमीनी हकीकत और गाइडलाइंस की अनदेखी कर तैयार किए जा रहे इन प्रश्नपत्रों के कारण बच्चों का रिजल्ट खराब होने की पूरी आशंका है, जिसकी गाज अंततः शिक्षकों पर ही गिरेगी।
सरकारी स्कूलों में होती है रेल परीक्षा
झारखंड के सरकारी स्कूलों में रेल यानी रेगुलर असेसमेंट फॉर इंप्रूव्ड लर्निंग परियोजना के तहत स्कूली बच्चों के लिए मासिक मूल्यांकन परीक्षा आयोजित की जाती है। इस विशेष प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य रट्टा मारने की प्रवृत्ति को खत्म करना और बच्चों में समझने व सीखने की क्षमता (लर्निंग आउटकम) में सुधार लाना है। इसके तहत शिक्षा विभाग और जेसीईआरटी द्वारा कक्षा 1 से 12वीं तक के छात्रों के लिए हर महीने नियमित रूप से टेस्ट लिए जाते हैं। इन परीक्षाओं के प्रश्नपत्र सीधे रांची से जारी होते हैं, जिन्हें शिक्षक गुरुजी एप के माध्यम से डाउनलोड करते हैं। इसके जरिए बच्चों की पढ़ाई के स्तर की लगातार मॉनिटरिंग की जाती है। लेकिन इस बार बिना पढ़ाए यह परीक्षा होने से शिक्षक एवं छात्र नाराज हैं।
सामान्य प्रश्न
लेखक के बारे में
Bhado Majhiशॉर्ट बायो : भादो माझी पिछले 17 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में 'हिन्दुस्तान' में प्रिंसिपल कोरेस्पोंडेंट के तौर पर जनजातीय बहुल इलाक़ों में पत्रकारिता कर रहे हैं।
परिचय एवं अनुभव
भादो माझी प्रिंट मीडिया जगत का एक प्रतिष्ठित नाम हैं, जिन्हें पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वह ‘हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में प्रिंसिपल कोरेस्पोंडेंट के तौर पर राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों पर नजर रखते हैं। जनजातीय समाज के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक एवं शैक्षिक पहलुओं के विश्लेषण पर उनका विशिष्ट अनुभव हैं। 2021 से इस भूमिका में रहते हुए उन्होंने प्रिंट मीडिया एवं डिजिटल कंटेंट के बदलते ट्रेंड्स और पाठकों की रुचि पर मजबूत पकड़ बनाई है।
करियर का सफर :
भादो माझी ने अपने करियर की शुरुआत 2009 में दैनिक जागरण अखबार से की, जहां उन्होंने प्रिंट पत्रकारिता की बुनियादी समझ विकसित की। 2015 में दैनिक जागरण में उन्हें लोकल कंटेंट क्रिएटर टीम का नेतृत्व दिया गया। 2015 से 2021 तक दैनिक जागरण में लोकल रिपोर्टिंग टीम का नेतृत्व करने के बाद वह ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि और रिपोर्टिंग
मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएट होने के कारण भादो माझी को पत्रकारिता की तकनीकी और फील्ड प्रैक्टिकलिटी की मजबूत समझ है। इसी वजह से उनका राजनीतिक बीट पर कमांड होने के साथ उन्हें जनजातीय समाज में आ रहे परिवर्तन की शोध स्तरीय विशेषज्ञता प्राप्त है। झारखंड के ट्राइबल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया स्टडीज के शोध छात्रों के लिए उन्होंने फ़ील्ड गाइड के रूप में भी अपनी एक्स्पर्टीज़ को साझा किया। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध उनकी शोध आधारित स्टोरीज को आज भी रेफरेंस के तौर पर जनजातीय मामलों की रिपोर्ट बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
ट्राइबल स्टडीज एवं योगदान
झारखंड के 32 (अब 33) जनजाति की रूढ़ि परंपरा से लेकर स्वशासन व्यवस्था के बारे में उनकी पकड़ न सिर्फ़ इन जनजातियों के बीच मज़बूत है बल्कि अलग अलग माध्यमों से इन समुदायों की स्थिति और संभावनाओं पर भी इनकी रिपोर्ट सरकार के नीति निर्धारकों तक के लिए इन जनजातियों का मंतव्य प्रस्तुत करती रही है। भादो माझी का मानना है कि पत्रकारिता की नींव तथ्यपरकता और विश्वसनीयता है—उनका लक्ष्य पाठकों को सटीक, प्रमाणिक और सशक्त जानकारी देना तो है ही, साथ ही वंचित वर्ग की आवाज बनकर नीति निर्धारकों तक वस्तुस्थिति पहुंचाना और भविष्य की रणनीति को बेहतर बनाने में अपना योगदान देना है।
विशेषज्ञता
झारखंड के 32 जनजाति समाज की समझ
रूढ़ि परंपरा पर गहरी पकड़
सुदूर गांवों के अंतिम पंक्ति में खड़े आदिवासियों से सीधा संवाद
झारखंड की सभी जनजाति की भाषा की जानकारी
देश की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति संथाल समाज से आना


