ट्रेंडिंग न्यूज़

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

हिंदी न्यूज़ देशकैसे भाजपा का विकल्प बनेगी देश की सबसे पुरानी पार्टी? 2014 के बाद ऐसे खोई जमीन

कैसे भाजपा का विकल्प बनेगी देश की सबसे पुरानी पार्टी? 2014 के बाद ऐसे खोई जमीन

जिन राज्यों में कांग्रेस ने सरकार बनाई भी थीं वहां भी राज्य स्तर के नेताओं का जादू लोकसभा चुनाव में नहीं चल पाया और कड़ी हार का सामना करना पड़ा। इनमें राजस्थान भी शामिल है।

कैसे भाजपा का विकल्प बनेगी देश की सबसे पुरानी पार्टी? 2014 के बाद ऐसे खोई जमीन
Ankit Ojhaहिंदुस्तान टाइम्स,नई दिल्लीTue, 27 Sep 2022 07:00 AM
ऐप पर पढ़ें

तीन सदियां देख चुकी कांग्रेस पार्टी एक समय अकेले ही पैन इंडिया पार्टी हुआ करती थी। आजादी के बाद कई दशकों तक राजनीति के गलियारों में केवल कांग्रेस का ही वर्चस्व था। हालांकि आज की स्थिति देखें तो पार्टी कहां खड़ी है? कांग्रेस के नेता खुद इस बात को मानते हैं कि पिछले 8 साल में कांग्रेस पार्टी ने धीरे-धीरे कर अपनी ज़मीन कोई है। वहीं 22 सितंबर को राहुल गांधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद को लेकर कहा था, यह केवल एक संगठन का पद नहीं है जो कि बल्कि एक विचारधारा का पद है जो कि भारत के दृष्टिकोण और विश्वास को दिखाता है।

राहुल गांधी के बयान के बाद ही आया राजस्थान में 'भूचाल'
राहुल गांधी ने जब 'एक व्यक्ति एक पद' की वकालत की इसके बाद से ही राजस्थान में सियासी उठापटक शुरू हो गई। सारे घटनाक्रम से साफ दिखायी देता है कि जब अशोक गहलोत को लगा कि उन्हें राजस्थान के मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ेगा और इससे सचिन पायलट का कद बढ़ेगा तो उनके समर्थक विधायकों ने विद्रोह कर दिया और वे इस्तीफा देने लगे। वे नहीं चाहते थे कि सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनें। स्पष्ट है कि गहलोत भी राजस्थान के मुख्यमंत्री का पद छोड़कर एक 'विचारधारा' वाला काम नहीं करना चाहते हैं। इससे वर्तमान की कांग्रेस पार्टी के बारे में क्या कहा जा सकता है?

लोकतंत्र में जनता वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुनती है और फिर प्रतिनिधियों के पसंद का नेता मुख्यंत्री या प्रधानमंत्री बनता है। हालांकि सच यह है कि इस बारे में ज्यादातर फैसले पार्टी हाई कमांड करता है। कई बार ऐसा होता है कि विधायक जिस व्यक्ति को नहीं पसंद करते हैं उसे भी मुख्यमंत्री बना दिया जाता है। राजस्थान में कुछ ऐसा ही सचिन पायलट के बारे में भी दिखाई देता है। पायलट की तुलना में गहलोत के पास बहुत ज्यादा विधायकों का समर्थन है। यहां तक कि निर्दलीय सहयोगी भी गहलोत का समर्थन करते हैं। इसके अलावा गहलोत की ही वजह से 6 बीएसपी एमएलए भी कांग्रेस में शामिल हो गए थे जिस वजह से विधानसभा में कांग्रेस की स्थिति चुनाव के बाद भी मजबूत हो गई। 

बात राजस्थान विधानसभा की करें तो जहां 2018 विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के पास 100 विधायक थे वे बढ़कर 2019 में 108 हो गए। भाजपा के 73 विधायक थे जो कि अब 71 ही बचे हैं। निर्दलीय 13 विधायक थे। बीएसपी के 6 विधायक थे जिनमें से अब कोई भी बीएसपी का नहीं बचा है। 

कांग्रेस के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजस्थान में इतनी सीटों पर जीत हासिल करने के बाद भी 2019 के लोकसभा चुनाव में गहलोत का जादू नहीं चल पाया। 2019 में कांग्रेस राजस्थान में एक भी सीट नहीं जीत पाई। यहां तक कि गहलोत के बेटे अपने गृह नगर जोधपुर से ही चुनाव हार  गए। जाहिर सी बात है कि यह एक बड़ी बेज्जती थी। सच तो यहा है कि इस कड़ी में केवल अशोक गहलोत ही नहीं थे बल्कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जहां कांग्रेस की सरकारें थीं, वहीं भी लोकसभा चुनाव में मुंह की खानी पड़ी। इससे यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या राज्य स्तर के  नेताओं में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का भविष्य तय करने की क्षमता है?


राज्य स्तर पर अगर हम मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में 2018 और 2019 में वोट शेयर का अंतर देखें तो इसमें बड़ा फर्क नजर आता है। 2018 में जहां राजस्थान में कांग्रेस के वोट शेयर 39.3 फीसदी था लोकसभा चुनाव के दौरान घटकर 34.3 फीसदी हो गया। मध्य प्रदेश में 40.9 फीसदी से 34.5 पर आ गया। वहीं छत्तीसगढ़ में 43 से घटकर 40.9 हो गया। सीट शेयर की बात करें तो राजस्थान में 49.7 फीसदी से घटकर 8.0 हो गया। मध्य प्रदेश में 49.6 फीसदी से घटकर 9.6 फीसदी और छत्तीसगढ़ में75.6 से घटकर 26.7 फीसदी हो गया। इस हिसाब से देखें तो उतना बड़ा अंतर वोट शेयर में नहीं आया जितना की सीटों के कन्वर्ट होने में हुआ है। 

हालल में पांच राज्यों में हुए चुनाव की बात करें तो सात ऐसे राज्य थे जहां कि पार्टी का कुल वोट शेयर 30  फीसदी से ज्यादा था। 2017 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद यह संख्या 12 थी। इससे पता चलता है कि 2014 के पास किस तरह से कांग्रेस जमीन खोती चली गई?

कई राज्यों में कांग्रेस के विधायकों को भी चुनाव में 10 फीसदी से कम वोट हासिल हुए। वहीं कांग्रेस को किसी सहयोगी का सहारा लेकर चुनाव लड़ना पड़ा। यह बताता है कि कैसे अब राज्यों में भी कांग्रेस सीमित हो गई है। वहीं जिन राज्यों में पार्टी की पकड़ मजबूत थी वहां भी भाजपा से हार का सामना करना पड़ा। पंजाब जैसा बड़ा राज्य आपसी कलह की भेंट चढ़ गया। इसीलिए लोग सवाल करने लगे हैं कि क्या सबसे पुरानी और विचारधारा की कही जाने वाली पार्टी भाजपा का विकल्प बनने में सक्षम है?
 

epaper