कुपोषण और इलाज के बीच में दवा छोड़ने से गोरखपुर-कुशीनगर के टीबी मरीजों में बढ़ रहा प्रतिरोध

हिन्दुस्तान, गोरखपुर
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कुशीनगर में टीबी मरीजों के इलाज की सफलता दर 41.5 प्रतिशत है, जबकि देवरिया और महाराजगंज में 90 प्रतिशत से अधिक है। गोरखपुर में सफलता दर 60 प्रतिशत है। कुशीनगर में आधे से अधिक मरीजों पर दवा बेअसर हो रही है, जिसका मुख्य कारण कुपोषण और दवा का बीच में छोड़ना है।

कुपोषण और इलाज के बीच में दवा छोड़ने से गोरखपुर-कुशीनगर के टीबी मरीजों में बढ़ रहा प्रतिरोध

चिंताजनक टीबी मरीजों के इलाज में कुशीनगर फिसड्डी, देवरिया अव्वल

देवरिया और महाराजगंज में 90 फ़ीसदी से अधिक है इलाज की सफलता दर

गोरखपुर में 60 फीसदी और कुशीनगर में 41.5 फीसदी है इलाज की सफलता दर

कुशीनगर में आधे से अधिक मरीजों पर बेअसर हो रही है दवा

गोरखपुर में दो तिहाई से कम मरीज पर ही हो रहा दवा का असर

गोरखपुर के करीब 40 फ़ीसदी मरीज पर बेअसर है दवा

जनवरी से लेकर मई तक के पूर्वी यूपी में टीबी मरीजों के इलाज के आंकड़े चिंताजनक

टीबी इलाज की असमानता

पूर्वी यूपी में टीबी के इलाज की सफलता दर में असमानता बढ़ रही है। मंडल के चार में से दो जिलों में दवा का असर घटने से मरीजों में दवा प्रतिरोधी रूप मिल रहा है। इसकी वजह कुपोषण और इलाज के बीच में दवा छोड़ना मुख्य वजह है। कुशीनगर में तो हर दूसरे टीबी मरीज का इलाज फेल हो जा रहा है। वहीं, गोरखपुर में पांच में से तीन मरीज ही इलाज का कोर्स पूरा कर टीबी को हरा पा रहे हैं।

सफलता दर के आंकड़े

इस वर्ष जनवरी से लेकर मई तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो देवरिया और महाराजगंज के टीबी मरीजों में इलाज की सफलता दर 94.23 और 92.42 प्रतिशत रही। ये जिले इलाज के मामले में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं, गोरखपुर में 6655 मरीजों में से 4018 ही स्वस्थ हुए। यहां सफलता दर 60.38 प्रतिशत रही। गोरखपुर में करीब 40 प्रतिशत मरीजों पर दवा असर नहीं दिखा। कुशीनगर की स्थिति सबसे चिंताजनक हैं। कुशीनगर में आधे से अधिक मरीजों पर दवा बेअसर हो रही है। जिले में 3657 मरीजों में से केवल 1,520 स्वस्थ हुए और सफलता दर महज़ 41.56 प्रतिशत रही।

कुपोषण और दवा छोड़ने की बातें

बीआरडी मेडिकल कॉलेज के टीवी एवं चेस्ट रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. अश्वनी मिश्रा ने बताया कि जिन मरीजों पर कोर्स पूरा होने के बाद दवा असर नहीं दिखी, उनके पीछे कई प्रमुख कारण हैं। सबसे बड़ी वजह कुपोषण है। बड़ी संख्या में ऐसे मरीज बेहद कमजोर आर्थिक परिस्थितियों वाले परिवारों से आते हैं। जहां पोषण स्तर बेहद कम है। डॉ. अश्वनी ने बताया कि टीबी की दवा तभी प्रभावी रहती है, जब मरीज का पोषण स्तर ठीक हो। बच्चों सहित कुपोषित मरीजों में दवा का असर कम या नहीं के बराबर रह जाता है।

दवा लेने में लापरवाही

बीच में दवा छोड़ रहे मरीज

डॉ. अश्वनी मिश्रा ने बताया कि इलाज के सफलता दर में कमी की दूसरी अहम वजह दवा का समय से पूरा न लेना यानी इलाज बीच में छोड़ देना है। डॉ. मिश्रा ने कहा कि कई मरीज सेहत में सुधार होते ही दवा छोड़ने लगते हैं। जबकि तय समय तक दवा लेना जरूरी है। ऐसे मरीजों में इलाज के बावजूद बैक्टीरिया मौजूद रह जाते हैं। समय के साथ दवा के प्रति प्रतिरोध विकसित हो जाता है। आंकड़ों के मुताबिक कुल मरीजों में महज दो फीसदी ऐसे हैं जिनमें पहले से ही दवा प्रतिरोध (ड्रग रेजिस्टेंस) पाया गया। बाकी मामलों में प्रतिरोध का कारण अक्सर मरीजों की लापरवाही या पोषण संबंधी कमजोरी रही है।

टीबी मरीजों की निगरानी

जरूरी है टीबी मरीजों की निगरानी

चेस्ट फिजीशियन डॉ. विनायक अग्रवाल ने बताया कि टीबी पर नियंत्रण के लिए दवा की आपूर्ति के साथ-साथ पोषण सहायता, मरीजों की लगातार निगरानी और समुदाय स्तर पर जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। बिना अनुशासन के दवा सेवन के प्रयास का प्रभाव सीमित रहेगा। इसमें लापरवाही से दवा प्रतिरोधी टीबी का खतरा बढ़ सकता है।

यह है जनवरी से मई तक मंडल के आंकड़े

- गोरखपुर में 6655 मरीजों से 4018 मरीज हुए स्वस्थ, 60.38 फीसदी रही इलाज की सफलता दर

- देवरिया में 2891 मरीजों से 2726 मरीज हुए स्वस्थ, 94.23 फीसदी रही इलाज की सफलता दर

- कुशीनगर में 3657 मरीजों से 1520 मरीज हुए स्वस्थ, 41.56 फीसदी रही इलाज की सफलता दर

- महराजगंज में 2691 मरीजों से 2487 मरीज हुए स्वस्थ, 92.42 फीसदी रही इलाज की सफलता दर

सामान्य प्रश्न

कुशीनगर में टीबी मरीजों की इलाज की सफलता दर कितनी है?
कुशीनगर में टीबी मरीजों की इलाज की सफलता दर महज़ 41.56 प्रतिशत है।
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