किशनगंज: रेफरल सिस्टम ने किशनगंज में बचाईं सैकड़ों नन्हीं जिंदगियां

Newswrap हिन्दुस्तान, भागलपुर
Follow us on Google News
share

किशनगंज से राकेश कुमार की रिपोर्ट किशनगंज। रात के करीब ढाई बजे थे। ठाकुरगंज

किशनगंज: रेफरल सिस्टम ने किशनगंज में बचाईं सैकड़ों नन्हीं जिंदगियां

किशनगंज से राकेश कुमार की रिपोर्ट किशनगंज। रात के करीब ढाई बजे थे। ठाकुरगंज प्रखंड के एक गांव में जन्म के आठ दिन बाद अचानक एक नवजात ने दूध पीना बंद कर दिया। उसका शरीर ठंडा पड़ने लगा और सांसें तेज चल रही थीं। परिवार घबरा गया। कुछ लोग सुबह होने का इंतजार करने की सलाह दे रहे थे, लेकिन तभी बच्चे की मां को आशा कार्यकर्ता गुलाबी देवी की बात याद आई। कुछ दिन पहले ही गांव में आयोजित बैठक में गुलाबी देवी ने सभी महिलाओं को समझाया था कि “यदि नवजात दूध पीना बंद कर दे, बहुत सुस्त हो जाए, तेजी से सांस ले, शरीर ठंडा पड़ जाए या शरीर नीला दिखने लगे तो यह सामान्य बात नहीं है।

ऐसे समय में इंतजार नहीं करना चाहिए, बल्कि ‘गोल्डन आवर’ के भीतर तुरंत एसएनसीयू पहुंचना चाहिए। मां ने बिना देर किए परिवार को तैयार किया और रात में ही बच्चे को सदर अस्पताल, किशनगंज स्थित स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) पहुंचाया गया। विशेषज्ञों ने तत्काल इलाज शुरू किया और कुछ दिनों बाद वही बच्चा स्वस्थ होकर अपनी मां की गोद में घर लौट आया।मां मुस्कुराते हुए कहती है,पहले हमें लगता था कि बच्चा थोड़ा कमजोर है तो अपने आप ठीक हो जाएगा। लेकिन आशा दीदी ने हमें खतरे के संकेत पहचानना सिखाया। आज मेरा बच्चा सुरक्षित है क्योंकि मुझे समय रहते पता चल गया कि उसे कहाँ ले जाना है। जिले में आज यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसके पीछे वर्षों की क्षमता निर्माण प्रक्रिया, लगातार प्रशिक्षण और सामुदायिक जागरूकता अभियान हैं।आशा कार्यकर्ता गुलाबी देवी बताती हैं,पहले लोग नवजात की सांस फूलने, दूध न पीने या अत्यधिक सुस्ती को सामान्य समझ लेते थे। अब हम गर्भवती महिलाओं, उनके पति और पूरे परिवार को पहले से बताते हैं कि ये डेंजर साइन हैं और ऐसी स्थिति में तुरंत एसएनसीयू जाना चाहिए। यही कारण है कि अब महिलाएं खुद सही निर्णय ले रही हैं।”सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. अनवर हुसैन बताते हैं कि नवजात शिशु के जीवन के शुरुआती घंटे और गंभीर स्थिति उत्पन्न होने के तुरंत बाद का समय सबसे महत्वपूर्ण होता है।उनके अनुसार,यदि गोल्डन आवर के दौरान सही उपचार मिल जाए तो कई गंभीर नवजातों की जान बचाई जा सकती है। इसलिए हमारा पूरा प्रयास है कि आशा कार्यकर्ता, एएनएम, जीएनएम और सभी स्वास्थ्यकर्मी डेंजर साइन की समय पर पहचान कर बिना विलंब रेफरल सुनिश्चित करें। सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी बताते हैं कि विश्व स्तर पर हुए अध्ययन भी इसी दिशा की पुष्टि करते हैं।वे कहते हैं की प्रतिष्ठित चिकित्सा शोध पत्रिका ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार प्रशिक्षित सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी और घर-घर नवजात देखभाल संबंधी जागरूकता से नवजात मृत्यु दर में लगभग 20 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है। इसी प्रकार अन्य अध्ययनों में यह पाया गया कि मीडिया के माध्यम से जानकारी प्राप्त करने वाली माताएं नवजात के खतरे के संकेतों को लगभग 2.85 गुना अधिक पहचान पाती हैं, जबकि परिवार विशेषकर पति की भागीदारी होने पर यह जागरूकता और बढ़ जाती है। जिले में भी हम इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जमीनी स्तर पर लागू कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य केवल इलाज देना नहीं, बल्कि हर परिवार को इतना जागरूक बनाना है कि नवजात में खतरे का कोई भी संकेत दिखने पर बिना देर किए सही स्वास्थ्य संस्थान तक पहुंचे। समय पर लिया गया एक निर्णय पूरे परिवार की खुशियां बचा सकता है।”गुलाबी देवी बताती हैं कि पहले निजी अस्पताल में प्रसव होने के बाद परिवार वहीं रुक जाता था, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। यदि बच्चे की हालत गंभीर होती है तो निजी संस्थानों से भी एसएनसीयू रेफर किया जा रहा है। इस बदलाव का असर आंकड़ों में भी दिखाई देता है। 01 जनवरी 2025 से 31 दिसम्बर 2025 तक कुल 769 बच्चे एडमिट हुए जिसमें से 660 बच्चे सकुशल अपने घर एवं 77 बच्चे को उच्चतर इलाज हेतु रेफर किया गया है जिनमें 121 नवजात निजी संस्थानों से रेफर होकर आये थे वही 01 जनवरी से 16 जून के बीच सदर अस्पताल स्थित एसएनसीयू में 330 नवजात भर्ती हुए, जिनमें से 277 स्वस्थ होकर घर लौटे, 32 को उच्च संस्थानों में रेफर किया गया, जबकि 41 नवजात निजी अस्पतालों से रेफर होकर आए और सफल उपचार के बाद स्वस्थ हुए। आज कई गांवों में यदि कोई नवजात दूध नहीं पीता या उसकी सांस तेज चलती है तो आसपास की महिलाएं खुद परिवार को सलाह देती हैं कि इंतजार मत करो, तुरंत एसएनसीयू चलो।गुलाबी देवी कहती हैं की मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि लोग मुझे जानते हैं, बल्कि यह है कि अब गांव की आम महिलाएं भी बिना किसी डॉक्टर के बताए खतरे के संकेत पहचान लेती हैं और सही समय पर अस्पताल पहुंच जाती हैं। सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने बताया कि जब परिवार स्वयं खतरे के संकेतों को पहचानने लगते हैं और समय पर स्वास्थ्य संस्थान तक पहुंचते हैं, तभी स्वास्थ्य सेवाओं का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है। किशनगंज का यह मॉडल बताता है कि क्षमता निर्माण, जन-जागरूकता और मजबूत रेफरल प्रणाली मिलकर नन्हीं जिंदगियों को सुरक्षित भविष्य दे सकती है।सदर अस्पताल का एसएनसीयू आज केवल एक उपचार केंद्र नहीं, बल्कि समुदाय आधारित नवजात सुरक्षा मॉडल के रूप में विकसित हो रहा है। अस्पताल की आधुनिक सुविधाओं के साथ आशा कार्यकर्ताओं का घर-घर संपर्क, नियमित प्रशिक्षण, प्रभावी रेफरल प्रणाली, निजी और सरकारी संस्थानों के बीच समन्वय तथा जन-जागरूकता अभियान यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि कोई भी नवजात केवल जानकारी के अभाव में अपनी जान न गंवाए। जिलाधिकारी विशाल राज ने कहा की स्वास्थ्य व्यवस्था तभी सफल मानी जाएगी जब समाज स्वयं स्वास्थ्य संबंधी सही निर्णय लेने लगे। किशनगंज में आशा कार्यकर्ताओं के क्षमता निर्माण, सामुदायिक जागरूकता, मीडिया सहयोग और मजबूत रेफरल प्रणाली ने ऐसा वातावरण बनाया है कि अब परिवार गोल्डन आवर का महत्व समझ रहे हैं। यही प्रयास नवजात मृत्यु दर में कमी लाने की दिशा में सबसे प्रभावी कदम है। आज सदर अस्पताल का एसएनसीयू केवल एक अत्याधुनिक उपचार इकाई नहीं, बल्कि विश्वास का केंद्र बन चुका है। यहां आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के साथ समुदाय, आशा कार्यकर्ता, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन मिलकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि कोई भी नवजात केवल जानकारी के अभाव या देर से निर्णय लेने के कारण अपनी जान न गंवाए। और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा संदेश है की जब हर मां खतरे के संकेत पहचान लेगी और गोल्डन आवर में सही निर्णय लेगी, तभी नवजात मृत्यु दर में वास्तविक कमी आएगी और हर नन्हीं जिंदगी को जीने का पूरा अवसर मिलेगा।

इस खबर पर आपकी क्या राय है?

Hindustan

लेखक के बारे में

Hindustan
हिन्दुस्तान भारत का प्रतिष्ठित समाचार पत्र है। इस पेज पर आप उन खबरों को पढ़ रहे हैं, जिनकी रिपोर्टिंग अखबार के रिपोर्टरों ने की है। और पढ़ें