देवशयनी एकादशी से थमेंगे मांगलिक कार्य, चार माह तक रहेगा चातुर्मास का अनुशासन
देवशयनी एकादशी से थमेंगे मांगलिक कार्य, चार माह तक रहेगा चातुर्मास का अनुशासन देवशयनी एकादशी से थमेंगे मांगलिक कार्य, चार माह तक रहेगा चातुर्मास का अन

कटिहार, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि आषाढ़ शुक्लपक्ष एकादशी के साथ ही सनातन परंपरा का चार माह का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक काल चातुर्मास शुरू हो जाएगा। इस वर्ष 25 जुलाई को पड़ने वाली देवशयनी (हरिशयनी) एकादशी के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाएंगे। इसके साथ ही विवाह, गृहप्रवेश, उपनयन समेत अधिकांश मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु 20 नवंबर की देवउठनी एकादशी को जागेंगे और 21 नवंबर से एक बार फिर शुभ एवं मांगलिक कार्यों की शुरुआत होगी।
तैयारी का दौर
कटिहार के मंदिरों में देवशयनी एकादशी को लेकर विशेष तैयारियां शुरू हो गई हैं। इस अवसर पर भगवान विष्णु का विशेष श्रृंगार, पूजन, भजन-कीर्तन, प्रवचन और महामृत्युंजय जाप का आयोजन होगा। श्रद्धालु भगवान विष्णु को तुलसी दल, शंख, नारियल, पीले वस्त्र, पुष्प और फलों का अर्पण कर व्रत एवं पूजा करेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में चले जाते हैं और सृष्टि के पालन का दायित्व भगवान शिव संभालते हैं। इसी अवधि को चातुर्मास कहा जाता है, जो तप, व्रत, संयम, स्वाध्याय और आध्यात्मिक साधना का श्रेष्ठ समय माना जाता है।
विवाह परहेज
इस अवधि में विवाह जैसे मांगलिक कार्यों स होता हैे परहेज
ज्योतिषीय दृष्टि से भी इस अवधि में विवाह जैसे मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है। इस बार मासांत दोष और गुरु के अस्त रहने के कारण भी पूरे चातुर्मास में वैवाहिक मुहूर्त उपलब्ध नहीं रहेंगे। ऐसे में चार माह तक शहनाइयों की गूंज थम जाएगी और देवउठनी एकादशी के बाद ही विवाह समारोहों का नया दौर शुरू होगा। चातुर्मास का प्रत्येक महीना धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। सावन भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना का महीना है, भाद्रपद में भगवान गणेश की उपासना का पर्व गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। आश्विन में शारदीय नवरात्र और विजयादशमी जैसे प्रमुख पर्व आते हैं, जबकि कार्तिक मास दीपावली, देव दीपावली और देवउठनी एकादशी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सवों का साक्षी बनता है।
आचार्य का मत
आचार्य अंजनी कुमार ठाकुर ने बताया कि देवशयनी एकादशी केवल भगवान विष्णु के शयन का पर्व नहीं, बल्कि आत्मसंयम, साधना और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश देने वाला पावन अवसर है। उन्होंने कहा कि धार्मिक शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत और भगवान विष्णु की आराधना करने से पापों का क्षय होता है तथा मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए शुभ ग्रहों का संयोग आवश्यक माना गया है, इसलिए चातुर्मास में ऐसे कार्य नहीं किए जाते। 20 नवंबर की देवउठनी एकादशी के बाद भगवान विष्णु के जागरण के साथ 21 नवंबर से पुन: सभी शुभ और मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाएंगे。


