पूर्वांचल में बदल रहा मच्छर संतुलन, हेमरेजिक डेंगू का खतरा बढ़ा
पूर्वांचल में मच्छरों की विभिन्न प्रजातियों के अनुपात में बदलाव हो रहा है। एडीज एल्बोपिक्टस की संख्या घट रही है जबकि एडीस इजिप्टी की संख्या बढ़ रही है। एनआईएचआर के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव हैमरेजिक डेंगू के मामलों को बढ़ा सकता है। डेंगू के चारों स्ट्रेन की पहचान हो चुकी है।

गोरखपुर, वरिष्ठ संवाददाता। पूर्वांचल में मच्छरों की विभिन्न प्रजातियों के अनुपात में बदलाव हो रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च (एनआईएचआर) के वैज्ञानिकों के प्रारंभिक शोध में यह जानकारी सामने आई है। एनआईएचआर के कीट विज्ञानियों के अनुसार, जिले में पहले प्रबल रहे एडीज एल्बोपिक्टस की संख्या घट रही है। जबकि एडीस इजिप्टी की संख्या में तेजी से विस्तार हो रहा है। इस बदलाव से आने वाले दिनों में हैमरेजिक डेंगू के मामले ज्यादा सामने आ सकते हैं। एनआईएचआर के कीट विज्ञानी डॉ. बृजरंजन मिश्रा के अनुसार शहरी इलाकों में एडीज इजिप्टी ने प्रजनन के लिए बेहतर हालात पा लिए हैं। फेंके हुए टायर, डिब्बे और पुराने बर्तन में जमा पानी में यह मच्छर आसानी से पनपता है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी पेड़-पौधों की टहनियों और छोटे-छोटे प्राकृतिक ठिकानों में एडीस एल्बोपिक्टस का बसेरा ज्यादा है। लेकिन बढ़ता शहरीकरण और कंक्रीट वाले इलाके एल्बोपिक्टस के लिए अनुकूल नहीं रहे, जिससे इसकी आबादी घट रही है.
खतरनाक है एडीज इजिप्टी
एनआईएचआर के निदेशक डॉ. हरिशंकर जोशी ने बताया कि एडीज इजिप्टी का प्रसार बढ़ना चिंताजनक है। इसकी वजह से हैमरेजिक डेंगू के मामले ज्यादा सामने आ सकते हैं। जिले में अब तक डेंगू के चारों स्ट्रेन की पहचान हो चुकी है। वर्ष 2018-19 में डेंगू से पीड़ित 61 मरीजों की जांच कर स्ट्रेन की पहचान की गई थी। जिसमें करीब 44 प्रतिशत मामलों में स्ट्रेन-दो पाया गया। जबकि 32 प्रतिशत मामलों में स्ट्रेन-तीन मिला। करीब 16 प्रतिशत मामलों में स्ट्रेन-एक और 6 प्रतिशत मामलों में स्ट्रेन-चार मिले। कुल मिलाकर डेंगू के दो तिहाई से अधिक मामलों में स्ट्रेन-दो और स्ट्रेन-तीन की भूमिका रही है.
नहीं कम हो रहे मच्छरों से पीड़ितों के मामले
जिला मलेरिया अधिकारी अंगद सिंह ने बताया कि इस साल अब तक जिले में डेंगू के लगभग 36 मामले रिपोर्ट हो चुके हैं। मलेरिया के 10 और इंसेफेलाइटिस के 15 मामले भी सामने आए हैं। डेंगू मच्छरों का प्रसार रोकने के लिए घरों और आसपास के इलाके की साफ-सफाई सबसे जरूरी है। फेंके हुए टायर, खाली डिब्बे, पौधों के गमले में जमा पानी और छतों पर खड़े पानी को तुरंत हटाया जाना चाहिए। खुले स्थानों पर पानी जमने से रोकने के लिए रीकैपिंग और सीलिंग जैसी सावधानियां भी जरूरी हैं.


