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chandrayaan 2: 58 साल में चांद पर पहुंचने की जिद

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चंद्रयान-2 के सफलतापूर्वक लांच होने के बाद भारत अंतरिक्ष में एक बड़ी शक्ति के तौर पर अपने को स्थापित करने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। 

भारत ने 1960 के दशक में अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू किया था और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे में यह काफी ऊपर है। इन 58 सालों में भारत की मुहिम चांद पर जाने की है। भारत का चांद पर यह दूसरा मिशन है। इससे पहले भारत ने चंद्रयान-1 2008 में लांच किया था। यह भी चांद पर पानी की खोज में निकला था। भारत चांद पर अपना मिशन ऐसे समय भेज रहा है जब अपोलो 11 के चांद मिशन की 50वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है।

इसिलए दक्षिणी धुव्र पर ही र्लैंंडिंग

चंद्रमा का दक्षिणी धुव्र एक ऐसा क्षेत्र है जहां अभी कोई देश नहीं पहुंच सक है। यहां कुछ नया मिलने की संभावना हैं। इस इलाके का अधिकतर हिस्सा छाया में रहता है और सूरज की किरणें न पड़ने से यहां बहुत ज्यादा ठंड रहती है। वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि हमेशा छाया में रहने वाले इन क्षेत्रों में पानी और खनिज होने की संभावना हो सकती है। हाल में किए गए कुछ ऑर्बिट मिशन में भी इसकी पुष्टि हुई है। 

2022 तक मानव को अंतरिक्ष में भेजने की योजना

इसरो की मंशा है कि वह जल्द ही 2022 तक ‘गगनयान’ से एक भारतीय को भारत की जमीन से और भारत के रॉकेट से अंतरिक्ष में भेजे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसका वादा कर चुके हैं कि भारत की स्वतंत्रता की 75वीं सालगिरह से पहले यह मिशन पूरा कर लिया जाएगा।

क्या होगा फायदा

पानी की मौजूदगी चांद के दक्षिणी धुव्र पर भविष्य में इंसान की उपस्थिति के लिए फायदेमंद हो सकती है। 

यहां की सतह की जांच ग्रह के निर्माण को और गहराई से समझने में भी मदद कर सकती है। 

साथ ही भविष्य के मिशनों के लिए संसाधन के रूप में इसके इस्तेमाल की क्षमता का पता चल सकता है। 

सौर प्रणाली के शुरुआत के साथ ही पृथ्वी के इतिहास को समझने में मदद मिलेगी। 

पानी की खोज और पानी मिल जाए तो वहां रहने की उम्मीद, यह चंद्रयान-2 के दो मकसद है। 

यह खोजेगा

चंद्रयान-2 का लैंडर विक्रम जहां उतरेगा उसी जगह पर यह जांचेगा कि चांद पर भूकंप आते है या नहीं। वहां थर्मल और लूनर डेनसिटी कितनी है। रोवर चांद के सतह की रासायनिक जांच करेगा। तापमान और वातावरण में आद्रता है कि नहीं।

चंद्रमा की सतह पर पानी होने के सबूत तो चंद्रयान 1 ने खोज लिए थे लेकिन चंद्रयान 2 से यह पता लगाया जा सकेगा कि चांद की सतह और उपसतह के कितने भाग में पानी है।

पहले के अभियान से अलग

चंद्रयान-1 में सिर्फ ऑर्बिटर था, जो चंद्रमा की कक्षा में घूमता था। 

चंद्रयान-2 के जरिए भारत पहली बार चांद की सतह पर लैंडर उतारेगा।

पानी का पता लगाया था

चंद्रयान-1 जब 2008 में लांच किया गया था तो उसने इस बात की पुष्टि की थी कि चांद पर पानी है लेकिन चांद की सतह पर नहीं उतर पाया था। 

चंद्रयान-1 की खोजों को आगे बढ़ाएगा चंद्रयान-2 

चंद्रयान-1 की खोजों को आगे बढ़ाने के लिए चंद्रयान-2 को भेजा जा रहा है। चंद्रयान-1 के खोजे गए पानी के अणुओं के साक्ष्यों के बाद आगे चांद की सतह पर, सतह के नीचे और बाहरी वातावरण में पानी के अणुओं के वितरण की सीमा का अध्ययन करने की जरूरत है।

चंद्रयान-1 ने चंद्रमा की कक्षा में 312 दिन बिताए थे

चंद्रयान-1 चंद्रमा पर जाने वाला भारत का पहला मिशन था। ये मिशन लगभग एक साल (अक्तूबर 2008 से सितंबर 2009 तक) था। 

चंद्रयान-1 को 22 अक्तूबर 2008 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अंतरिक्ष में भेजा गया था

ये 8 नवंबर 2008 को चंद्रमा पर पहुंच गया था। इस चंद्रयान ने चंद्रमा की कक्षा में 312 दिन बिताए थे। तत्कालीन इसरो के चेयरमैन जी माधवन नायर ने चंद्रयान मिशन पर संतोष जताया था

माधवन ने बताया था कि चंद्रयान को चंद्रमा के कक्ष में जाना था, कुछ मशीनरी स्थापित करनी थी।  

रूस के मना करने पर खुद बनाया लैंडर-रोवर

नवंबर 2007 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस ने कहा था कि वह इस परियोजना में साथ काम करेगा। साथ ही वह इसरो को लैंडर देगा। 2008 में इस मिशन को सरकार से अनुमति मिली 2009 में चंद्रयान-2 का डिजाइन तैयार कर लिया गया। जनवरी 2013 में र्लांंचग की योजना थी। लेकिन रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रॉसकॉसमॉस लैंडर नहीं दे पाई। इसके बाद इसरो ने चंद्रयान-2 की लर्ॉंन्चग मार्च 2018 तय की। लेकिन कुछ परिक्षण के लिए र्लांंचग को अप्रैल 2018 और फिर अक्तूबर 2018 तक टाला गया। इस बीच, जून 2018 में इसरो ने फैसला लिया कि कुछ बदलाव करके चंद्रयान-2 की र्लांंचग जनवरी 2019 में की जाएगी।

सबसे ताकतवर रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 प्रयोग  

जीएसएलवी मार्क-3 भारत का अब तक का सबसे शक्तिशाली रॉकेट लांचर है। इसे पूरी तरह से देश में ही बनाया गया है। तीन चरणों का यह रॉकेट चार हजार किलो के उपग्रह को 35,786 किमी से लेकर 42,164 किमी की ऊंचाई पर स्थित जियोसिनक्रोनस ऑर्बिट में पहुंचा सकता है।  या फिर, 10 हजार किलो के उपग्रह को 160 से 2000 किलोमीटर की लो अर्थ ऑर्बिट में पंहुचा सकता है।

अपोलो कार्यक्रम की लागत से काफी कम बजट

भारत के पहले मार्स सैटलाइट की लागत स्पेस विज्ञान पर बनी फिल्म ग्रैविटी से भी कम थी। वहीं चंद्रयान-2 की लागत 14.1 करोड़ डॉलर है जो कि अमेरिका के अपोलो प्रोग्राम की लागत 25 अरब डॉलर से काफी कम है। 

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  • Web Title:chandrayaan 2 the insistence of reaching the moon in 58 years