विभावि पीजी संस्कृत विभाग में महाकवि बाणभट्ट रचित चण्डी शतकम् पर व्याख्यान आयोजित
हजारीबाग में विभावि पीजी संस्कृत विभाग द्वारा आयोजित पंचदिवसीय व्याख्यानमाला के तीसरे दिन महाकवि बाणभट्ट के चण्डी शतकम् पर व्याख्यान हुआ। मुख्य वक्ता डॉ घनश्याम चन्द्र उपाध्याय ने चण्डी शतकम् की रचना के बारे में जानकारी दी और शोधार्थियों को पाठभेद पर शोध करने की सलाह दी।

हजारीबाग, शिक्षा प्रतिनिधि। विभावि पीजी संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित पंचदिवसीय व्याख्यानमाला के तीसरे दिन गुरुवार को कला भवन के तुलसीदास सभागार में महाकवि बाणभट्ट रचित चण्डी शतकम् विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया । जिसमें बतौर मुख्य वक्ता राजस्थान के डॉ घनश्याम चन्द्र उपाध्याय ने कहा कि चण्डी शतकम् की रचना महाकवि बाणभट्ट ने 606-648 ईस्वी सन् में की।
प्रमुख जानकारी
कुछ पाण्डुलिपियों से प्राप्त चण्डी शतक में केवल 70 श्लोक ही प्राप्त होते हैं। जिससे यह प्रतीत होता है कि महाकवि बाणभट्ट ने केवल 70 श्लोकों की रचना की और उसके पुत्र ने शेष श्लोकों को लिखा होगा। सम्प्रति प्राप्त चण्डी शतकम् में 102 श्लोक हैं। विभिन्न प्रकाशन के चण्डीशतक ग्रंथों में 78 श्लोकों में पाठभेद प्राप्त होते हैं। शोधार्थी को इस विषय पर भी शोध करना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती का सत्र
द्वितीय सत्र में मुख्य वक्ता ने दुर्गा सप्तशती से संबंधित व्यवहार संबंधी जानकारी दिया तथा सप्तशती के सात सौ श्लोक के बारे में जानकारी दी। साथ ही डेक्कन युनिवर्सिटी के पुस्तकालय से प्राप्त पाण्डुलिपि के अनुसार प्राधानिक रहस्य, वैकृतिक रहस्य और मूर्ति रहस्य को मार्कण्डेय पुराण से संदर्भित होने की पुष्टि की। धन्यवाद ज्ञापन विभागाध्यक्षा डॉ अंजुम आरा ने की। पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ अखिलेश्वर पाठक, हिंदी विभागाध्यक्ष , डॉ सुबोध सिंह शिवगीत समेत शिक्षकगण और छात्र छात्राएं मौजूद थे।


