भारतेंदु ही आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता : डॉ. रामसुधार सिंह
वाराणसी में भारतेंदु हरिश्चंद्र की 176वीं जयंती पर समारोह आयोजित किया गया। साहित्यकार डॉ. रामसुधार सिंह ने हरिश्चंद्र के योगदान पर चर्चा की, जो केवल साहित्य में ही नहीं बल्कि निज भाषा को राज-काज का माध्यम बनाना चाहते थे। छात्रों ने उनके नाटकों का मंचन किया।

वाराणसी। हिन्दी साहित्य गगन के इंदु भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ही वस्तुतः आधुनिक हिन्दी के जन्मदाता हैं। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी लेखनी से हिन्दी को समृद्ध किया। उनके जीवन की सार्थकता निज भाषा की उन्नति में निहित थी। साहित्यकार डॉ. रामसुधार सिंह ने मंगलवार को भारतेंदु हरिश्चंद्र की 176वीं जयंती पर आयोजित समारोह में यह बातें कहीं। हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में आयोजित समारोह में उन्होंने कहा कि भारतेंदु निज भाषा को मात्र साहित्य का माध्यम नहीं मानते थे। उनकी कामना थी कि निज भाषा ही राज-काज, शिल्पों के विवरण और विज्ञान की भाषा बने। विशिष्ट अतिथि बीएचयू की हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. श्रद्धा सिंह ने भारतेंदु हरिश्चंद्र की पत्रकारिता पर चर्चा की।
अध्यक्षता प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष रमा रमण ने की। इसके बाद छात्रों ने भारतेंदु के नाटकों का मंचन किया l हिन्दी प्रवक्ता डॉ. रेनु सिंह ने उनके कृतित्व पर चर्चा की। स्वागत प्रधानाचार्य डॉ. उमेश कुमार सिंह, संचालन महामाया उपाध्याय, सिद्धिनाथ कुमार और धन्यवाद ज्ञापन अजय कुमार त्रिपाठी नें किया। इस दौरान भारतेंदु वंशज दीपेश चौधरी, प्रबंधक मोहन कृष्ण अग्रवाल, सत्येन्द्र कुमार, डॉ. हरजिंदर श्रीवास्तव, राहुल सिंह, राज कुमार गौतम, विनय तिवारी, ब्रजेश कुमार सिंह, गिरिजेश तिवारी, कबीर कुमार राव, विभा गौर, राजीव श्रीवास्तव आदि उपस्थित रहे।दूसरी तरफ, हरिश्चंद्र पीजी कॉलेज में संस्थापक की जयंती पर ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिन्दी का भविष्य’ विषय पर चर्चा की। मुख्य अतिथि प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने तकनीकी के लाभ गिनाए तो खामियां भी इंगित कीं। अध्यक्षता प्राचार्य प्रो. रजनीश कुंवर ने की। विशिष्ट अतिथि भारतेंदु के वंशज दीपेश चौधरी ने उनके जीवन प्रसंगों पर चर्चा की। संयोजन प्रो. ऋचा सिंह ने किया। इस दौरान डॉ. राम आशीष, प्रो. विश्वनाथ वर्मा, प्रो. रागिनी श्रीवास्तव, प्रो. संगीता श्रीवास्तव, प्रो. अनुपम शाही, प्रो. ओम शर्मा, डॉ. सत्येन्द्र कुमार सिंह, डॉ. शिवानंद यादव आदि मौजूद रहे।


