Celebrating Dr Rahi Masoom Raza A Tribute to a Literary Legend
डॉ. राही मासूम रजा के जन्मशताब्दी समारोह का उद्घाटन दिल्ली में हुआ। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और शैक्षणिक कार्यक्रमों की घोषणा की गई। राही के लेखन को उनकी मानवता, करुणा और सामंजस्य के लिए याद किया गया। उन्होंने अपने साहित्य में आम आदमी को केंद्रित किया…
नई दिल्ली, एजेंसी। डॉ. राही मासूम रजा के वर्ष-भर चलने वाले जन्मशताब्दी समारोह का औपचारिक शुभारंभ शनिवार को पीएचडी हाउस, दिल्ली में हुआ। इस कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय सार्वजनिक माटी न्यास द्वारा किया गया। डॉ. राही मासूम रज़ा (1 सितंबर 1927 – 15 मार्च 1992), जो बी.आर. चोपड़ा के धारावाहिक 'महाभारत' के अमर संवादों और 'आधा गांव', 'टोपी शुक्ला', 'दिल एक सादा कागज़' तथा 'कटरा बी-आरज़ू' जैसे कालजयी उपन्यासों के लिए प्रसिद्ध हैं, उन्हें एक ऐसे मूर्धन्य लेखक के रूप में याद किया गया जिन्होंने साहित्य, सिनेमा और भारत की समन्वयकारी (गंगा-जमुनी) संस्कृति को एक सूत्र में पिरोया।
कार्यक्रम का आरंभ
कार्यक्रम की शुरुआत नूपुर सिंधु नारायण की सुरीली संगीतमय प्रस्तुति से हुई, जिन्होंने राही की ग़ज़लें, भजन और फिल्मी गीत प्रस्तुत किए। माटी न्यास के ट्रस्टी और मुख्य आयोजक आसिफ़ अज़मी ने उद्घाटन वक्तव्य में घोषणा की कि इस जन्मशताब्दी वर्ष के दौरान पूरे भारत में 100 साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने कहा, यह पहल राही के साहित्यिक उत्तराधिकारियों, प्रशंसकों और अध्येताओं का साझा प्रयास है। यह केवल एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि राही के एकता, करुणा और सत्य के संदेश को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प है।
प्रमुख वक्ता की बातें
डॉ. सोनल मानसिंह (पद्म विभूषण एवं पूर्व सांसद): कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा, राही जी केवल एक लेखक नहीं थे, वे हमारे समय की अंतरात्मा थे। महाभारत के माध्यम से उन्होंने भारत के हर घर से संवाद किया। उनके कालजयी शब्द 'मैं समय हूं' ने हमें याद दिलाया कि समय ही सबसे बड़ा न्यायाधीश है।
न्यायमूर्ति विनीत सरन (अध्यक्ष, रावी-ब्यास जल न्यायाधिकरण एवं पूर्व न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय): दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए उन्होंने कहा, राही सदैव प्रासंगिक रहेंगे। उनके लेखन मानव पीड़ा, गरिमा और सहनशीलता के अनमोल दस्तावेज़ हैं। उनका साहित्य आने वाली पीढ़ियों को एक सशक्त राष्ट्र के रूप में जीने की प्रेरणा देता रहेगा।
न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया (न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय एवं मुख्य अतिथि): उन्होंने कहा, राही को अमर बनाती है उनकी आमफ़हम भाषा। यह भाषा आमजन की धड़कन है। उन्होंने हमें सिखाया कि सच्चा लोकतंत्र हमारे साझा मूल्यों, विविधता और मानवता में ही जीवित रहता है।
मुज़फ़्फ़र अली (प्रसिद्ध फिल्मकार एवं मुख्य वक्ता) ने भावुक होते हुए कहा, राही ने सिनेमा को कविता की तरह लिखा और जीवन को सिनेमा की तरह जिया। 'गमन' के प्रवासी के दर्द से लेकर 'अंजुमन' की मिटती तहज़ीब तक, उनका एक वाक्य दस साल के इंतज़ार का भार उठा लेता था। मेरी इच्छा थी कि वे मेरे लिए लिखें, और उन्होंने 'अंजुमन' के लिए जो लिखा, वह लाजवाब है।"
ममता कालिया (वरिष्ठ लेखिका) ने कहा कि राही ने आम आदमी को अपने साहित्य के केंद्र में रखकर सम्मान दिया। 'आधा गाँव' और 'असंतोष के दिन' में उन्होंने वह दर्द लिखा जिसे इतिहास की किताबें भूल गईं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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