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देशमहाराष्ट्र ही नहीं यूपी, गुजरात, दिल्ली जैसे राज्यों में भी ब्लैक फंगस लील रहा जिंदगियां

हिन्दुस्तान टाइम्स,नई दिल्लीPublished By: Sudhir Jha
Wed, 12 May 2021 08:12 PM
महाराष्ट्र ही नहीं यूपी, गुजरात, दिल्ली जैसे राज्यों में भी ब्लैक फंगस लील रहा जिंदगियां

देश में कोरोना कहर के बीच अब म्यूकोरमाइकोसिस या ब्लैक फंगस के केस भी तेजी बढ़ने लगे हैं। कोरोना से रिकवर हो चुके कई लोगों के लिए यह दुर्लभ संक्रमण जानलेवा साबित हो रहा है। मध्य प्रदेश के जबलपुर से महाराष्ट्र के ठाणे तक में इस वजह से लोगों को जान गंवानी पड़ी है तो देश के कई हिस्सों में इसके मरीज मिल रहे हैं। सोमवार को ओडिशा में इसका पहला केस मिला तो दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी नए केस मिले हैं। दिल्ली एम्स में भी ब्लैक फंगस मरीजों के लिए अलग वार्ड बनाया गया है।

म्यूकोरमाइकोसिस साइनस, ब्रेन और लंग्स पर बुरा असर डालता है जो डायबिटिक, कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगों जैसे कैंसर या एचआईवी मरीजों के लिए जानलेवा हो सकता है। म्यूकोरमाइकोसिस के लक्षणों में सिरदर्द, बुखार, आंखों के नीचे दर्द, नाक बंद होना, आंशिक अंधापन आदि शामिल है। कुछ मरीजों में कफ, सांस में तकलीफ, खून की उल्टी जैसे लक्षण भी दिख सकते हैं। 

डॉक्टरों का मानना है कि म्यूकोरमाइकोसिस, जिसकी मृत्युदर 50 फीसदी है, स्टेरॉयड के अधिक इस्तेमाल से हो सकता है, जोकि कोरोना के गंभीर रोगियों को जिंदगी बचाने के लिए दिया जा रहा है। स्टेरॉयड कोरोना मरीजों के लंग्स में सूजन को घटाता है। लेकिन ये इम्यूनिटी को भी घटाते हैं और ब्लड सूगर को तेजी से बढ़ा देते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इम्यूनिटी घटने से म्यूकोरमाइकोसिस हो सकता है। 

जबलपुर में 1 मई से अब तक तीन मरीजों की मौत ब्लैक फंगस की वजह से हो चुकी है। करीब 10 लोग अंधे हो चुके हैं तो 40 अन्य का भोपाल, इंदौर, खांडवा, जबलपुर और ग्वालियर में चल रहा है। राज्य के चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि ब्लैंक फंगस से ग्रस्त मरीजों के लिए अलग वार्ड बनाए जाएंगे। सारंग ने कहा, ''म्यूकोरमाइकोसिस संक्रमित मरीजों की सर्जरी के लिए भोपाल और जबलपुर के मेडिकल कॉलेज में अलग यूनिट बनाए जाएंगे।''

बुधवार को महाराष्ट्र के ठाणे जिले में ब्लैक फंगस की वजह से दो और मरीजों की मौत हो गई। अधिकारियों ने बताया कि जिले में छह और मरीजों का इलाज चल रहा है। स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने कहा कि राज्य में म्यूकोरमाइकोसिस के करीब 2 हजार केस हो सकते हैं और सरकार ने इन मरीजों के इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों जैसे किंग एडवर्ड मेमोरियल, पारेल और बीवाईएल नायर हॉस्पिटल के इस्तेमाल का फैसला किया है। 

राजस्थान के जयपुर में ब्लैक फंगस के 14 केस सामने आ चुके हैं। सवाई माधो सिंह हॉस्पिटल में ईएनटी डिपार्टमेंट के हेड मोहनिश ग्रोवर ने कहा कि पिछले साल अगस्त से दिसबंर के बीच इस संक्रमण के 24 केस सामने आए थे। उन्होंने कहा, ''कोविड-19 से पहले एक साल में एक या दो ऐसे केस सामने आते थे। लेकिन कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में केस तेजी से बढ़ रहे हैं। अस्पताल में 2-3 केस हर दिन आ रहे हैं।'' उन्होंने यह भी कहा कि पहले मृत्यदर 30-50% थी जो घटकर 10 फीसदी रह गई है। उन्होंने यह भी कहा कि इस लहर में अधिक लोगों की देखने की शक्ति जा रही है। 

पिछले महीने हैदराबाद में कम से कम 70 केस सामने आए हैं और कम से कम छह की मौत हो चुकी है। अपोलो अस्पताल में 50 ऐसे केस सामने आए तो शेष 2 अन्य कॉर्पोरेट हॉस्पिटल में। अपोलो अस्पताल के डॉ. के सुब्बा रेडी ने कहा, ''मौजूदा समय में अस्पताल में 10 मरीजों का इलाज चल रहा है और सभी स्थिति गंभीर है। मरीजों को आइसोलेट किया गया है और इलाज किया जा रहा है।''

ओडिशा में 18 अप्रैल को एक 71 वर्षीय बुजुर्ग के गले का स्वैब लिया गया था, जिसकी रिपोर्ट ब्लैक फंगस पॉजिटिव आई है। 8 मई को उनकी आंखें सूज गई थीं और नाक से काले रंग का पदार्थ निकलने लगा था। एक सरकारी अधिकारी ने कहा, 'मरीज के सैंपल से पता चलता है कि मरीज को फंगल इन्फेक्शन था। यह इन्फेक्शन मरीज को कोरोना होम आइसोलेशन के दौरान हुआ था।' इसके अलावा छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग ने भी ब्लैक फंगस के 15 मामलों की पुष्टि की है। राज्य सरकार का कहना है कि इन मरीजों को रायपुर स्थित एम्स में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। 

एक स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा, 'ब्लैक फंगस के इन्फेक्शन के मामले स्टेरॉयड की ज्यादा डोज के चलते सामने आ रहे हैं। इससे शुरुआती दौर में इलाज के लिए कहा जाता है। लेकिन कई बार इसके ज्यादा इस्तेमाल से मरीज की आंखों को नुकसान पहुंचता है।' इससे पहले बीते एक महीने से ज्यादा समय में गुजरात से ब्लैक फंगस इन्फेक्शन के 100 से ज्यादा मामले सामने आए हैं। ऐसे मरीजों के लिए गुजरात सरकार की ओर से अलग से वार्ड भी हॉस्पिटलों में तैयार किए गए हैं। हेल्थ वर्कर्स का कहना है कि ऐसे मामलों में कई मरीजों को अपनी आंखों की रोशनी भी गंवानी पड़ी है।

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