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अलविदा 2018: समलैंगिकता जुर्म के दायरे से बाहर, सुप्रीम कोर्ट के चार बड़े फैसले

four big decision of supreme court in 2018

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर माह में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-377 को अतार्किक और मनमानी करार देते हुए कहा कि समलैंगिकता कोई मानसिक विकार नहीं है। यह जैविक और प्राकृतिक है। लोगों को यौन प्राथमिकता चुनने का अधिकार न देना समानता का अधिकार न देने के बराबर है।

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि आईपीसी की धारा-377 भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 में प्राप्त समानता के अधिकार का हनन करती है। देश में सहमति से दो वयस्कों के बीच बनाए जाने वाले समलैगिंक संबंधों को अपराध नहीं माना जाएगा।

मालूम हो कि धारा-377 में अप्राकृतिक यौन संबंधों को अपराध के तौर परिभाषित किया गया था। इसके तहत जो कोई भी प्रकृति की व्यवस्था के विपरीत किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ यौनाचार करता है, उसे उम्रकैद या दस साल तक जेल और जुर्माने की सजा देने का प्रावधान था। ब्रिटिश हुकूमत ने वर्ष 1861 में इसे आईपीसी में शामिल किया था। जुलाई 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक संबंधों को मान्यता देने की मांग करने वाले नाज फाउंडेशन की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान धारा-377 को गैरकानूनी करार दिया था।

हालांकि दिसंबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए कहा था कि यह मामला संसद पर छोड़ देना चाहिए। 2014 में नाज फाउंडेशन ने फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की, पर सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।

2016 में इस मामले में एक और पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई। जनवरी 2018 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने इसे संविधान पीठ के पास भेज दिया। 6 सितंबर को संविधान पीठ ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया। उसके इस प्रगतिशील फैसले की पूरे विश्व में चर्चा हुई।

राफेल पर सरकार को क्लीन चिट
14 दिसंबर को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने फ्रांस से पांचवीं पीढ़ी के उन्नत लड़ाकू विमान ‘राफेल' की खरीद को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।

कोर्ट ने सरकार को सभी मुद्दों पर क्लीन चिट देते हुए कहा कि वायुसेना के लिए इन विमानों की खरीद का फैसला लेने की प्रकिया में कोई खामी नहीं थी। जहां तक इनकी कीमत का मामला है तो कोर्ट उसमें दखल नहीं देगा क्योंकि यह विमानों में लगे हथियारों के पैकेज से संबंधित होने के नाते गोपनीय है। कोर्ट ने सौदे में एक निजी कंपनी को भारतीय आफसेट पार्टनर बनाने के मुद्दे पर भी सरकार को क्लीन चिट दे दी। .

हालांकि इसमें कुछ विवाद हो गया है और अब विपक्ष ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत को कैग (नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक) रिपोर्ट के संबंध में गलत जानकारी उपलब्ध कराई, जबकि कैग ने अभी इस मामले में रिपोर्ट दी ही नहीं है। इस पर सरकार ने कहा है कि उसने गलत जानकारी नहीं दी बल्कि यह एक व्याख्यात्मक नोट के कारण हुआ है, जो उसने विमानों की कीमतों के बारे में जानकारी देते वक्त कोर्ट में दिया था। सरकार ने इसमें सुधार के लिए आवेदन भी दाखिल कर दिया है। हालांकि इस पर सुनवाई नए वर्ष में होगी। 

मस्जिद में नमाज के मुद्दे पर फैसला
अयोध्या का राम जन्मभूमि विवाद भी शीर्ष अदालत में छाया रहा। कोर्ट ने एक फैसला देकर साफ कर दिया कि मस्जिद को इस्लाम का हिस्सा नहीं मानने वाले साल 1994 के इस्माइल फारूकी फैसले का मौजूदा भूमि विवाद से कोई ताल्लुक नहीं है। लिहाजा इस पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है।

दरअसल, उस फैसले में संविधान पीठ ने माना था कि नमाज कहीं भी, यहां तक कि खुले मैदान में पढ़ी जा सकती है। इसके लिए मस्जिद जरूरी नहीं है। मुस्लिम पक्ष का कहना था कि कोर्ट के इस फैसले से पूरा भूमि विवाद प्रभावित हुआ है। लखनऊ पीठ ने 2010 में इसके आधार पर ही विवादित स्थल के तीन हिस्से करने का फैसला दिया था, क्योंकि संविधान पीठ कह चुकी थी कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।

सबरीमाला में महिलाओं को प्रवेश
28 सितंबर को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में रजस्वला उम्र (10 से 50 साल) की महिलाओं के प्रवेश पर लगी सदियों पुरानी रोक निरस्त कर दी। पीठ ने कहा कि महिला चाहे किसी भी उम्र की क्यों न हो, उसे मंदिर में जाने से मना नहीं किया जा सकता है। केरल में इस फैसले का जबरदस्त विरोध हुआ। कई महिलाएं सबरीमाला मंदिर में दर्शन के लिए बढ़ीं, लेकिन उन्हें रास्ते में ही रोक दिया गया। यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट में फैसले को लेकर कई पुनर्विचार याचिकाएं भी दायर की गईं, जिन पर अगले साल विचार होगा। रजस्वला उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की अनुमति इसलिए नहीं दी जाती है, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वहां स्थापित भगवान अयप्पा नैष्तिक ब्रह्मचारी हैं।

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  • Web Title:Bye bye 2018 Four major decisions of Supreme Court including on Sexuality