भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण का चेतन अस्तित्व-प्रो.प्रवेश भारद्वाज
उत्तर प्रदेश की मिर्जापुर में आयोजित सात दिवसीय बोधि-पथ कार्यशाला के चौथे दिन, बौद्ध दर्शन की पर्यावरण और जीव संरक्षण में प्रासंगिकता पर चर्चा हुई। प्रोफेसर प्रवेश भारद्वाज ने भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को माता का दर्जा देने पर जोर दिया, जबकि प्रोफेसर प्रतिभा मिश्रा ने बुद्ध के उपदेशों को आधुनिक पर्यावरण संकट के लिए महत्वपूर्ण बताया।

मिर्जापुर,संवाददाता। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग के अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान लखनऊ और केबीपीजी कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय बोधि-पथ कार्यशाला के चौथे दिन शुक्रवार को पर्यावरण और जीव संरक्षण में बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया। प्रथम सत्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर प्रवेश भारद्वाज ने सतत विकास एवं पर्यावरण संरक्षण में बौद्ध दृष्टिकोण पर व्याख्यान देते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण को एक जड़ वस्तु न मानकर चेतन अस्तित्व और माता का दर्जा दिया गया है। जहां मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं,बल्कि उसका एक हिस्सा है।
वैदिक काल से लेकर बौद्ध दर्शन और रामायण जैसे महाकाव्य तक, हमारी परंपरा में प्रकृति, पर्यावरण और वन्य जीवों के संरक्षण को धर्म और नैतिक कर्तव्यों से जोड़कर देखा गया है। वहीं द्वितीय सत्र में डीएवीपीजी कालेज वाराणसी के इतिहास विभाग की प्रोफेसर प्रतिभा मिश्रा ने बताया कि ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भगवान बुद्ध ने जो उपदेश दिए, वे आज के पर्यावरण संकट के समाधान के लिए बेहद प्रासंगिक हैं। बौद्ध दर्शन मुख्य रूप से निम्नलिखित सिद्धांतों पर पर्यावरण चेतना की बात करता है। कार्यशाला की अध्यक्षता प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. इन्दुभूषण द्विवेदी ने और संयोजक डॉ. कुलदीप पाण्डेय रहे। प्रोफेसर भानु प्रताप सिंह ने अतिथियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।इस अवसर पर प्रो. अर्चना पांडेय, प्रो. नम्रता मिश्रा, डॉ. अमित कुमार सिंह, डॉ. रवीन्द्र प्रताप सिंह, डॉ.राजमणि, डॉ. आमोद कुशवाहा, डॉ. प्रांकुर आनन्द, डॉ. रघुनाथ यादव, डॉ. करनैल सिंह आदि प्राध्यापक एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।


