सुपौल : भारत छोड़ो आंदोलन में सुपौल में युवाओं ने फूंका था क्रांति का बिगुल
कोसी क्षेत्र की धरती ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सुपौल जिले के युवाओं का संघर्ष पेश किया। कुशेश्वर मल्लिक और जयराम मिश्र जैसे युवाओं ने आंदोलन का नेतृत्व किया और गिरफ्तार किए गए। उनकी कुर्बानियां आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई हैं।

त्रिवेणीगंज, निज प्रतिनिधि। कोसी क्षेत्र की धरती केवल प्राकृतिक आपदाओं और संघर्षों के लिए ही नहीं, बल्कि देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए हुए आजादी के संग्राम में दिए गए अपने ऐतिहासिक और अतुलनीय योगदान के लिए भी जाना जाता है ।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन
वर्ष 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान सुपौल जिले के युवाओं की टोली और नागरिकों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अग्रिम मोर्चे पर खड़े होकर संघर्ष का नेतृत्व किया था। जिले के दर्जनों युवाओं ने अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद कर मजबूती से आंदोलन की कमान संभाली, गिरफ्तारियां दीं और जेल की सख्त यातनाएं सहीं। आजादी के आठ दशक बाद भी इन वीरों की गाथाएं नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।
कुशेश्वर मल्लिक का योगदान
सुपौल जिले के जगतपुर गांव निवासी कुशेश्वर मल्लिक महज 16 वर्ष की किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। साल 1942 में जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया था ,तब कुशेश्वर मल्लिक गणपतगंज स्थित हरावत हाई स्कूल में मैट्रिक के छात्र थे। उन्होंने अपने साथी अच्युतानंद झा, जयराम मिश्र और कुलानंद मल्लिक के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल आजादी का फूंक दिया। ये लोग घूम धूम कर आम जनता से आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का आह्वान किया। इस दौरान युबा कुशेश्वर मलिक गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें लगभग तीन वर्षों तक जेल में रहना पड़ा। वर्ष 1945 में जेल से रिहा होने के बाद वे कांग्रेस के संगठनात्मक और सामाजिक कार्यों में लगातार सक्रिय रहे।
स्वतंत्रता सेनानी जयराम मिश्र
जगतपुर के ही निवासी स्वतंत्रता सेनानी जयराम मिश्र की गिनती 1942 के आंदोलन का प्रमुख रणनीतिकार के रूप में होती थी। उनका आवास स्थानीय क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकों और भावी योजनाओं का प्रमुख केंद्र हुआ करता था। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गांव-गांव जाकर लोगों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद वे सुपौल अनुमंडल कांग्रेस के मंत्री पद पर रहे और जीवनपर्यंत राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों में समर्पित रहे। स्वतंत्रता आंदोलन में जिले के कई अन्य महान सेनानियों ने भी अग्रणी भूमिका निभाई। इनमें रामचंद्र प्रसाद सिंह, बिनायक प्रसाद यादव, बाबू बैकुण्ठ सिंह, सरोवर मंडल, शिवनंदन झा, सुरेश्वर पांडे, बैजनाथ यादव, फूलकुमारी देवी, हरिनारायण मिश्र व लक्ष्मी नारायण साह आदि प्रमुख हैं। इन क्रांतिकारी वीरो ने गांव-गांव में जन-जागरण फैलाकर आंदोलन को अभूतपूर्व गति प्रदान करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई और बार-बार जेल की यात्रा की। इनके अदम्य साहस और त्याग ने कोशी क्षेत्र में स्वतंत्रता संग्राम को एक मजबूत आधार प्रदान किया।
आम नागरिकों का योगदान
सुपौल जिले में स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें केवल वरिष्ठ नेता ही नहीं, बल्कि गांव-कस्बों के आम नागरिक और किशोर उम्र के छात्र भी शामिल थे। किसी ने डाकघर और सरकारी संस्थानों के सामने विरोध प्रदर्शन किया, तो किसी ने अंग्रेजों की नजरों से बचकर गुप्त संदेश पहुंचाने का काम किया। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब राष्ट्र तिरंगा फहराता है, तो सुपौल के इन चर्चित और गुमनाम नायकों के संघर्षों को नमन करना अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। इनकी कुर्बानियां इस बात की गवाह हैं कि आजादी केवल बड़े शहरों या राष्ट्रीय स्तर के आन्दोलनों से ही हासिल नहीं हुई, बल्कि इसकी वास्तविक कीमत देश के कोने-कोने में बसे आम लोगों ने भी चुकाई थी।


