हींग-स्टार एनीस की खेती से बदलेंगे किसानों के आय के समीकरण
देश में महंगी मसाला फसलों का घरेलू उत्पादन बढ़انے की तैयारी है। इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और किसानों को अधिक आय का विकल्प मिलेगा। डॉ. पंवार ने उच्च मूल्य वाली मसाला फसलों की संभावनाओं पर जोर दिया है। साथ ही किसानों को तकनीकी विकास में भागीदारी का भी महत्व बताया है।

देश में आयात पर निर्भर महंगी मसाला फसलों का घरेलू उत्पादन बढ़ाने की तैयारी है। इससे जहां किसानों को पारंपरिक फसलों के अलावा अधिक आय देने वाली फसलों का विकल्प मिल सकेगा, वहीं मसालों के आयात पर देश का भार भी कम होगा। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (आईआईएफएसआर), मोदीपुरम के पूर्व निदेशक डॉ. पंवार को भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान (आईआईएसआर), कोझिकोड, केरल की अनुसंधान सलाहकार समिति (आरएसी) का सदस्य नामित किया गया है। इसके बाद उन्होंने आयात-निर्भर मसाला फसलों के देश में उत्पादन की संभावनाओं पर जोर दिया है। डॉ. पंवार के अनुसार हींग और स्टार एनीस जैसी उच्च मूल्य वाली मसाला फसलों को भारत की अनुकूल कृषि-जलवायु परिस्थितियों में विकसित करने की संभावनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिए। इन फसलों के लिए उपयुक्त क्षेत्रों की पहचान कर स्थान के अनुसार खेती की तकनीक विकसित की जाए तो किसानों के लिए नया लाभकारी कृषि व्यवसाय तैयार हो सकता है।
पश्चिमी यूपी में भी तलाशेंगे संभावनाएं
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहले से गेहूं-धान और अन्य पारंपरिक फसल प्रणालियां प्रचलित हैं। ऐसे में मसाला और उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों को कृषि प्रणाली में शामिल कर किसानों की आय के नए स्रोत विकसित किए जा सकते हैं। इसके लिए मिट्टी, मौसम, पानी और बाजार की उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों की उपयुक्तता का अध्ययन जरूरी होगा।
किसान होंगे शोध का हिस्सा
डॉ. पंवार का जोर केवल फसल को खेत तक पहुंचाने पर नहीं, बल्कि उन्नत रोपण सामग्री, पोषण प्रबंधन, सिंचाई, पौध संरक्षण, कटाई के बाद प्रबंधन और मूल्य संवर्धन की पूरी तकनीक विकसित करने पर है। इससे फसल की उत्पादकता और किसानों की लाभप्रदता दोनों बढ़ाई जा सकती हैं।
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डॉ. पंवार के शोध कार्य की खासियत किसान-केंद्रित दृष्टिकोण रही है। वर्ष 2016 से 2023 तक किसानों के साथ काम करते हुए उन्होंने खेत की वास्तविक समस्याओं को शोध का आधार बनाने पर जोर दिया। उनका मानना है कि किसान केवल तकनीक के इस्तेमाल करने वाले नहीं, बल्कि तकनीक के विकास और परीक्षण की प्रक्रिया में भी भागीदार होने चाहिए।
आईआईएफएसआर, मोदीपुरम के निदेशक रहते हुए उन्होंने समेकित कृषि प्रणाली (आईएफएस) के जरिए फसल उत्पादन के साथ विभिन्न कृषि उद्यमों को जोड़कर किसानों की आय बढ़ाने और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर काम किया। प्राकृतिक खेती में भी उन्होंने मृदा स्वास्थ्य, स्थानीय संसाधनों के पुनर्चक्रण, फसल विविधीकरण और टिकाऊ कृषि प्रणाली पर जोर दिया।
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आयात घटाने के साथ किसानों को दोहरा फायदा
वैज्ञानिकों के अनुसार यदि हींग, स्टार एनीस जैसी आयात-निर्भर मसाला फसलों के लिए देश में उपयुक्त क्षेत्र और उत्पादन तकनीक विकसित हो जाती है तो इसका फायदा दो स्तर पर होगा। किसानों को प्रति इकाई क्षेत्र अधिक आय वाली फसल का विकल्प मिलेगा, जबकि देश को विदेशी बाजार से मसालों की खरीद पर होने वाले खर्च को कम करने में मदद मिलेगी। इससे कृषि विविधीकरण, किसानों की आय वृद्धि, आयात प्रतिस्थापन और आत्मनिर्भरता को एक साथ बढ़ावा मिल सकता है।


