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पुस्तक समीक्षा: परिवर्तनशील मीडिया में सनातन मूल्यों की खोज ' नारदीय संचार नीति'

समुद्र मंथन को लेकर संवाद संचार की अवधारणा को लेखक ने नवीन दृष्टि प्रदान की है जो प्रभावित करती है। मंथन में संपूर्ण संचारीय मान्यताओं का निरुपण होता है जो कि वर्तमान समय में सर्वाधिक प्रासंगिक है।

पुस्तक समीक्षा: परिवर्तनशील मीडिया में सनातन मूल्यों की खोज ' नारदीय संचार नीति'
Himanshu Jhaलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्ली।Sat, 25 May 2024 08:31 AM
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इक्कीसवीं सदी सूचनाओं के विस्फोट की दुनिया है। यत्र तत्र सर्वत्र सच को उजागर कर देने का शोर है। संचार माध्यम अब अखबारी समय से निकलकर सजीव प्रसारण की 'अभी-अभी' के तत्काल तक पहुंच चुका है। तथ्यों और जानकारियों से भरी किताबें पुस्तकालयों से निकलकर पृष्ठ दर पृष्ठ चमकती हुई मोबाइल की सतह पर तैरती रहती हैं। सारे माध्यम सच की सटीकता के दावे के साथ तैर रहे हैं। अब सूचनाओं का संचरण मोबाइल की तरंगों की ही तरह सेकेंड की कई सतहों में उलझा हुआ है। कोई व्यक्ति किसी सूचना का एक धागा खींचता है और उसके सामने तथ्यों की पूरी लुंडी खुलकर गिर जाती है। ऐसे में वह संशयग्रस्त हो जाता है कि सत्य क्या है? वास्तविक रुप से यदि वह किसी घटना की सच्चाई जानता भी है तो भी ढेर सारे संभावनाओं के प्रश्न, विभिन्न संचार माध्यम उसके अंदर, उसके ही देखे सत्य पर संदेह खड़ा कर देते हैं।

ऐसे उलझे आधुनिक बौद्धिक समय में "नारदीय संचार नीति" पुस्तक संशय विमर्श को सम्यक दृष्टि देने का प्रयास करती है । प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित डा. जय प्रकाश सिंह द्वारा रचित इस पुस्तक में उन्होंने संचार की नीति का स्वरूप स्पष्ट किया है। संचार का होना तय है जैसे वायु का होन।। सूचनाओं का आदान-प्रदान मानव समाज का स्थायी स्वभाव है। मानव समाज की इस सामुहिक प्रकृति को वास्तविक सत्य तक पहुंचाने के लिए भारतवर्ष में संचार की अनोखी परंपरा रही है। यह परंपरा है संवाद की, प्रश्नोत्तर की, शास्त्रार्थ की। प्रश्नोत्तर एवं संवाद के सबसे बड़े प्रतीक हैं देवर्षि नारद । पुस्तक में लेखक ने मात्र तीन अध्यायों में बड़ी सरलता से भारतीय संचार के नीति निर्धारण की मूल धारा को नारद जी के द्वारा स्थापित करता है।  देवर्षि नारद मात्र टहलने वाले भक्त नहीं है बल्कि  " देवर्षि नारद सभ्यतागत स्मृति के सबसे बड़े सर्जक, संवाहक और उत्प्रेरक हैं। भारतीय वाड.मय उनकी उपस्थिति से ओत-प्रोत है। ... उनकी प्रेरणा के कारण ही रामायण और भागवत अस्तित्व में आए। " (पृष्ठ संख्या २९)

हमारे देश में संवाद की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। ज्ञान का साक्षात्कार करके, संवाद द्वारा उसे ठीक-ठीक स्थापित किया जाता रहा है। वेदों, उपनिषदों में वर्णित ऋषियों का शेष से प्रश्नोत्तरी अथवा शास्त्रार्थ, संवाद के महानतम अवसर हैं।  संवाद की  इन्हीं ज्ञानमयी परंपरा से सत्य का संचार होता है।  संवाद की ज्ञानमयी परंपरा के प्रथम सहज संचारक हैं महामुनि भक्त नारद, जिनकी सहज अप्रतिहत त्रिकालगति है। नारदजी सनातन ज्ञानधारा के आदि मनीषी हैं जिनकी नारायणी वीणा संचार का प्रतीक है। 

आधुनिक समय में इन्टरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की विश्रृंखल बहाव से सारा बौद्धिक जगत, जब मानकों का मनमाना ठीहा खोज रहा है तब ऐसे संशय समय में "नारदीय संचार नीति" एक सम्यक स्थापना करती है कि संचार के संदर्भ में यदि कोई  सात्विक स्थापना हो सकती है तो हमें आज की तथाकथित आधुनिकता में नारद जी को पुनः समझना पड़ेगा। इसी विचार बिन्दु को कठिन शोध और चिंतन के उपरान्त लेखक ने अपनी किताब "नारदीय संचार नीति" में  बीजारोपित किया है। 

लेखक देवर्षि नारद के संचारीय गुणों को मुख्य रूप से प्रस्थापित करता है। आधुनिक संचार व्यवस्था में संवाद सम्यक तरीके से स्थापित नहीं हो पाता जिससे सत्य सामने होने पर भी संशय विद्यमान रहता है। इसका समाधान लेखक ने 'त्रिपुटी भारतीय मानस ' की अवधारणा में व्यक्त किया है । वे कहते हैं -  " लोक, वेद और ऋषि की त्रिपुटी भारतीय मानस को रचती है। .... लोक अवलोकन का प्रतीक है, वेद शास्त्रीय - पुस्तकीय ज्ञान का प्रतीक है और ऋषि साधना और अनुभूति का प्रतीक है।" 

उपरोक्त पंक्तियों में लेखक ने संचार नीति के तीन नियामक आधार की प्रतिष्ठा की है जिसकी सम-सामयिक व्याख्या हम स्वयं ही समझ सकते हैं। 

देवर्षि नारद जी का व्यक्तित्व किसी फिल्म - सीरियल वाले हास्य वृत्ति पैदा करने वाले नहीं हैं बल्कि सहज कल्याण प्रकृति के दयालु किन्तु खरा सच कहने वाले हैं जिससे देवता, राक्षस एवं सामान्य भक्त सभी उनकी बातें मानते हैं। उनकी विश्वसनीयता सबमें स्वीकार्य है। विश्वसनीयता की स्वीकार्यता आज के मीडिया संचार में संदिग्ध है। यह गुण देवर्षि नारद जी से सीखनी चाहिए।

समुद्र मंथन को लेकर संवाद संचार की अवधारणा को लेखक ने नवीन दृष्टि प्रदान की है जो प्रभावित करती है। समुद्र मंथन में संपूर्ण संचारीय मान्यताओं का निरुपण होता है जो कि वर्तमान समय में सर्वाधिक प्रासंगिक है। 

संवाद ही लोकतंत्र को प्राणवान बनाता है। संवाद एकतरफा नहीं हो सकता। सार्थक लोकतंत्र की मजबूत व्याख्या सटीकता से  इन पंक्तियों में व्यक्त होता है  "संवाद एकरस नहीं होता। एक ही मान्यताओं को मानने वाले लोगों के बीच संवाद से अधिक समर्थन होता है। " ( पृष्ठ संख्या ५४ )

संवाद और समर्थन की स्पष्ट विभाजक रेखा लोगों को भीड़ न बनने का साहस प्रदान करती है। संचार प्रक्रिया में संवाद ही मुख्य बिन्दु है जिससे सभ्यता के उच्च मूल्यों को नीतिपतित होते समाज में पुनः बोया जा सकता है। इस भाव को लेखक ने सूत्रवाक्य में बड़ी ही चिंतनशीलता के उपरान्त स्थापित किया है। जैसे  " संवाद परिवर्तन और पुरातन के बीच सेतु बनकर उसे सनातन बनाए रखता है। " परिप्रेक्ष्य नामक अध्याय में वर्णित यह सूत्रवाक्य लगभग पूरी किताब का निचोड़ प्रस्तुत करती है।

भाषा में लेखक ने सरलता का ध्यान रखने की कोशिश जरूर की है परन्तु संस्कृतनिष्ठ पौराणिक शब्दावली प्रायः भारी जान पड़ती है।  ऐसे शब्द संस्कार वर्तमान पीढ़ी में लगभग नहीं है। इसलिए सरल लोक मुहावरे, वार्ता की शैली होती तो इसका प्रभाव अधिक होता।  छोटे - छोटे बिन्दु के शीर्षक और अधिक खुलासे, वार्ता की मांग करते हैं शायद अध्याय की। 

भारत वर्तमान सदी में पिछली दासता प्रतीकों से उबरकर जिस तरह से वैश्विक परिदृश्य में नेतृत्व को आतुर है उस परिस्थिति में विभिन्न साम्प्रदायिक एवं राजनीतिक हितों के दबाव में किस तरह से संवाद करेगा?  इस चुनौती का समाधान संचार नीति की नारदीय विधा को अपनाकर विश्वसंवाद में सभी की अपनी अपनी सामुदायिक पहचान को रखते हुए भी संतुष्ट कर सकता है।   प्रसंग अध्याय में नारदजी के विभिन्न संवाद का संदर्भ वर्णित है जिनके प्रश्नोत्तरी द्वारा वर्तमान वैश्विक राजनीति की समस्याओं का भी समाधान मिलता है। आज के समाज की सबसे बड़ी विडंबना है मतांतर और अपने मत को ही अंतिम सत्य मानना। सब के मत की विभिन्नता को रखते हुए भी अच्छे कार्य में मोड़ देना अत्यंत दुष्कर कार्य है। अपने ही लोगों के बीच नेतृत्व करना और नेतृत्व करते हुए अपनों के बीच सहनशील एवं मर्यादित रहना, सरसता, एकता बनाए रखने के लिए देवर्षि - श्रीकृष्ण का संवाद महत्वपूर्ण प्रसंग है जिसमें आज के परिवार से लेकर देश और राजनीति से लेकर पार्टी तक एक मूल्य प्रदान करती है।

संचार, समय, नीति, संवाद, पत्रकारिता और मीडिया में रुचि रखने वाले व जो इन बिन्दुओं को महत्वपूर्ण हस्तक्षेप मानते हैं परिवर्तन का, उन्हें यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

प्रभात प्रकाशन से छपी इस पुस्तक का मुखपृष्ठ आकर्षक बना है और  लेखन शैली भी गतिमान  है। संचार के साथ कला से सम्बद्ध अध्येताओं के लिए यह अवश्य पठनीय पुस्तक है क्योंकि कला भी तो एक संचार-प्रक्रिया ही है। 

---- त्रिवेणी प्रसाद तिवारी
लेखक कला और संचार इतिहास के अध्येता हैं।