हजारीबाग में रक्तदान आंदोलन की जमीनी हकीकत
हजारीबाग में रक्तदान महाअभियान के तहत रक्तदान के प्रति घटते रुझान और संस्थागत भागीदारी की कमी पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था पर असर डालने वाली निरंतर रक्त की कमी के कारण युवा वर्ग में रक्तदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

हजारीबाग, हमारे प्रतिनिधि। अपने अखबार हिंदुस्तान रक्तदान महाअभियान के तहत हजारीबाग में नौवें दिन का मंथन एक गंभीर सवाल पर आकर थम गया है कि आखिर शहर में रक्तदान के प्रति घटता रुझान और सुस्त पड़ती संस्थागत भागीदारी का जिम्मेदार कौन हैं शहर के ब्लड बैंकों में लगातार बनी रहने वाली खून की कमी और लाइफ-सेविंग मुहिम में स्थानीय संस्थाओं की उदासीनता ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो हजारीबाग में स्वैच्छिक रक्तदान की दर मांग की तुलना में बेहद चिंताजनक है। जिले के कॉलेजों में एनएसएस और एनसीसी जैसी सक्रिय इकाइयां मौजूद हैं, लेकिन रक्तदान शिविरों का आयोजन अक्सर औपचारिकताओं और कागजों तक ही सीमित है। वहीं, शहर के कई एनजीओ केवल जयंती या विशेष त्योहारों के दिन फोटो-अवसर के लिए शिविर लगाते हैं। परिणाम यह होता है कि रक्त का स्टॉक निरंतर नहीं बन पाता और आपातकालीन स्थितियों में मरीजों के परिजनों को भटकना पड़ता है。
संस्थान की जिम्मेदारी
हजारीबाग के औद्योगिक घरानों की भूमिका भी यहाँ कटघरे में है। सीएसआर फंड के तहत रक्तदान शिविरों को प्राथमिकता न देना अत्यंत खेदजनक है। जबकि उद्योगों के पास संसाधनों और कर्मचारियों की एक बड़ी फौज है, वहां रक्तदान का कम होना इस आंदोलन की सबसे बड़ी विफलता है।
रक्तदान को जीवनशैली बनाना
हजारीबाग के ब्लड बैंकों की जीवन-रेखा तब तक सुरक्षित नहीं हो सकती, जब तक रक्तदान को स्वैच्छिक और निरंतर नहीं बनाया जाता। युथ विंग रेड क्रॉस जैसी संस्थाओं के उत्साह और सक्रियता को यदि शैक्षणिक संस्थानों की नियमितता और औद्योगिक घरानों के सीएसआर फंड का साथ मिल जाए, तो हजारीबाग इस महाअभियान में एक मिसाल बन सकता है।
समाजिक उत्तरदायित्व का अभाव
हजारीबाग में रक्त का संकट की कमी का कारण सोशल रिस्पांसिबिलिटी का अभाव है। यदि शहर की प्रमुख 20 संस्थाएं साल में मात्र दो बार भी शिविर आयोजित करें, तो रक्त की किल्लत समाप्त हो सकती है। उन्होंने यूनिवर्सिटी और औद्योगिक इकाइयों में रक्तदान क्लब बनाने और नियमित रक्तदाताओं को प्रोत्साहन देने का सुझाव दिया है। -डां क्षितिज आंनद, विभागाध्यक्ष शिशु रोग विभाग, शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल, हजारीबाग
युवाओं का योगदान
रक्तदान को आपातकालीन जरूरत' के बजाय जीवनशैली के रूप में अपनाना होगा। उन्होंने कहा कि हजारीबाग में युथ विंग रेड क्रॉस जैसी संस्थाएं जमीनी स्तर पर बेहतरीन कार्य कर रही हैं, लेकिन जब तक इसे व्यापक सामाजिक उत्तरदायित्व नहीं बनाया जाएगा, तब तक दिखावे के शिविर ही होते रहेंगे। हमें एक ऐसी समर्पित युवा फौज की जरूरत है जो बिना किसी दिखावे के नियमित रक्तदान करे। -भवानी शंकर गुप्ता, समाजिक कार्यकर्ता, सपोर्ट एनजीओ।
रक्तदान फोबिया
युवाओं के बीच व्याप्त रक्तदान फोबिया को मुख्य बाधा बना हुआ है। छात्रों को रक्तदान के फायदों के बारे में वैज्ञानिक रूप से जागरूक करने की आवश्यकता है। शिक्षण संस्थानों में युथ विंग, रेड क्रॉस, अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर नियमित कार्यशालाएं और काउंसलिंग सत्र आयोजित करना अनिवार्य है ताकि युवाओं का डर दूर हो सके। - रुद्रशेखर, जिला युवा पदाधिकारी, माय भारत युवा, हजारीबाग


