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ओडिशा चुनाव ने तोड़ा राजनीतिक मिथक, लोस-विधानसभा चुनाव में BJP को मिले मत में 6% का अंतर

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इस बार ओडिशा में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में दो प्रमुख राजनीतिक दलों को मिले वोट प्रतिशत में अहम बदलाव देखा गया है। एक साथ हुए चुनावों में करीब छह फीसदी मतदाताओं ने लोकसभा और विधानसभा के लिए अलग-अलग दलों को वोट दिया। दूसरे, शब्दों में कहें तो भाजपा को विधानसभा के लिए लोकसभा की तुलना में छह फीसदी वोट कम मिले। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह अपवाद है क्योंकि जब एक साथ चुनाव होते हैं तो दलों का मत प्रतिशत भी एक जैसा होता है। कहीं अंतर दिखे भी तो वह मामूली होता है। 

जिन राज्यों में चुनावों पर इस बार पूरे देश की नजर लगी हुई थी, उनमें पश्चिम बंगाल के अलावा ओडिशा भी एक राज्य था। ओडिशा में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी हुए। इन चुनावों में मुख्य मुकाबला बीजद एवं भाजपा के बीच हुआ। लोकसभा चुनाव में बीजद को 42.8 तथा भाजपा को 38.4 फीसदी वोट मिले। जबकि विधानसभा चुनाव में बीजद को 44.7 और भाजपा को 32.5 फीसदी वोट मिले। मत प्रतिशत बताता है कि लोकसभा चुनाव में बीजद अपने वोट बैंक को काफी हद तक साथ रखने में सफल रहा है तथा उसे महज 1.3 फीसदी का नुकसान हुआ है। जबकि भाजपा को जो 16 फीसदी मतों का फायदा हुआ है, उसमें करीब 12 फीसदी क्षति कांग्रेस की हुई है। भाजपा को सात सीटों का फायदा हुआ तो बीजद ने आठ सीटें खोई। दूसरे, इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भाजपा ने अपना मत प्रतिशत तो बढ़ाया लेकिन कांग्रेस और अन्य दलों के मतों में सेंध लगाकर। ऐसी ही बढ़त भाजपा को पश्चिम बंगाल में भी मिल थी। 

दूसरी तरफ विधानसभा चुनाव में बीजद लोकसभा की तुलना में 1.3 फीसदी ज्यादा मत हासिल करने में सफल रहा। लेकिन विधानसभा में भाजपा की शानदार बढ़त को ब्रेक लग गए तथा लोकसभा की तुलना में करीब छह फीसदी वोट उसे कम मिले। इससे साफ होता है कि तटस्थ मतदाताओं के मन में स्पष्ट था कि राज्य में बीजद की सरकार बनानी है और केंद्र में भाजपा की। बता दें कि बीजद की पांच सीटें विधानसभा में घटी जबकि भाजपा की 13 सीटें बढ़ी हैं। 

सीएसडीएस के विशेषज्ञ संजय कुमार कहते हैं कि जब लोकसभा एवं विधानसभा का चुनाव एक साथ होते हैं तो दलों का मत प्रतिशत एक जैसा रहता है। यहां तक की यदि लोकसभा चुनाव के छह सात महीने के भीतर भी विधानसभा चुनाव होते हैं तो भी मत प्रतिशत उसी पैटर्न पर रहता है। लेकिन ओडिशा का चुनाव इसका अपवाद है। इसने एक साथ चुनाव के मिथक को तोड़ा है। छह फीसदी मतदाताओं द्वारा लोकसभा के लिए भाजपा को ज्यादा वोट देने से साफ है कि उनकी सोच स्पष्ट थी कि वे केंद्र में भाजपा को और राज्य में बीजद की सरकार चाहते हैं। कुमार के अनुसार ऐसा अपवाद 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी देखा गया था। जब लोकसभा चुनावों के कुछ ही महीनों के बाद हुए चुनाव में आम आदमी पार्टी भारी बहुमत से जीत गई थी जबकि लोकसभा चुनावों में सभी सीटें भाजपा को मिली थी। 

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  • Web Title:BJP Vote Percentage Margin in Odisha Lok Sabha Elections and Assembly Elections is 6 Percent