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Bihar loksabha election result: महागठबंधन यानी नाम बड़े और दर्शन छोटे

  नई दिल्ली में बुधवार को महागठबंधन के नेताओं की बैठक के बाद उपेंद्र कुशवाहा, शक्ति सिंह गोहिल, जीतन

नाम महागठबंधन लेकिन प्रदर्शन घटिया। यानी नाम बड़े और दर्शन छोटे। पांच जातीय और क्षेत्रीय क्षत्रपों के महागठबंधन को 40 में महज दो सीटें। दो में से एक सीट किशनगंज कांग्रेस की परंपरागत रही है। इस हाहाकारी पराजय की वजह कई गिनाए जाएंगे। अलग-अलग मुंह, बातें हजार। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि बिहार की जनता को विकास की राजनीति रास आ गई है। अब उसे जातीयता अथवा क्षेत्रीयता के झुनझुने से बहलाया नहीं जा सकता।

अब सबको सड़क, बिजली, पानी चाहिए। जातीय हिंसा की बजाय रोजगार चाहिए। इसका बड़ा प्रमाण है बिहार में माय समीकरण का टूटना। 17वीं लोकसभा के लिए सुपौल, मधेपुरा, बांका,  भागलपुर, अररिया, कटिहार, उजियारपुर, खगड़िया, सीवान और काराकाट के परिणाम गवाही दे रहे कि कोई समीकरण नहीं, जनता को सिर्फ विकास और सुरक्षित भविष्य की आश्वस्ति संग क्रियान्वयन चाहिए।

बड़ी हार की एक अन्य वजह यह कि गठबंधन के नेताओं में एक होड़ सी दिख रही थी कि कैसे किसी दूसरे को अपने से बड़ा न होने दें। चाहे तेजस्वी हों या उपेंद्र कुशवाहा या फिर जीतन राम मांझी। नतीजा, राजद चार सीट से फिसलकर एक और कांग्रेस भी दो से घटकर एक पर सिमट गई। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा को पिछले चुनाव में एनडीए के साथ तीन सीटों पर विजय मिली थी लेकिन इस बार खुद भी दोनों सीट (काराकाट और उजियारपुर) से पराजित हो गए। जीतन राम मांझी को पूर्व मुख्यमंत्री होने का रुतबा भी नहीं जीता सका।

ऊंची दुकान फीके पकवान की कहावत अक्सर चरितार्थ होती रही महागठबंधन में। साझा कार्यक्रम की घोषणा कर बड़े नेता अक्सर गायब रहते। कई बार तो गठबंधन दलों के तीसरे दर्जे के नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस की। इस मामले में बिहार कांग्रेस के नेता सबसे ज्यादा रईस नजर आए। कहीं भी गठबंधन के सभी बड़े नेताओं ने एक साथ रैली या सभा नहीं की। ऐसे में वोटर भी दुविधा में रहे और आपसी स्पर्धा के कारण नेता एक दूसरे के उम्मीदवारों के पक्ष में अपने प्रभाव वाले मतदाताओं को प्रेरित नहीं कर सके। तेजस्वी के साथ अक्सर मुकेश सहनी जरूर होते थे मगर जीत लायक वोट वह खुद के लिए भी नहीं जुटा सके। यह जरूर है कि सहनी समाज के वह एक उभरते नेता बन गए हैं। 

बार बार बदलती निष्ठा के कारण जनता के सामने जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा खुद को गंभीरता से प्रस्तुत कर पाने में सफल नहीं हो सके। बिहार में महागठबंधन का प्रमुख चेहरा माने जाने वाले तेजस्वी प्रसाद भी राहुल गांधी के साथ मंच साझा करने से परहेज करते दिखे। हम, वीआईपी और रालोसपा को अधिक सीटें दी गईं ताकि कांग्रेस को दबाकर रखा जा सके। आपसी साठगांठ में कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह के बेटे को कांग्रेस की बजाय रालोसपा का टिकट दिया गया। कहा जा रहा है कि बेगूसराय सीट पर सीपीआई को गठबंधन सहयोग करता तो यह सीट उसके खाते में जाती। मगर, कन्हैया बिहार की राजनीति में चुनौती न बन सकें इसलिए तेजस्वी ने वहां अपना उम्मीदवार उतार दिया।

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