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29 अक्तूबर, 2020|8:35|IST

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Bihar Elections: नेताओं के नौकरी के वादे पर भरोसा करने से पहले जान लीजिए बिहार में उद्योग-धंधों के तबाह होने की कहानी

bihar closed industry

बिहार चुनाव में बेरोजगारी सबसे बड़े मुद्दे के तौर पर उभरी है और हर पार्टी युवाओं को नौकरी देने का वादा कर रही है। सरकारी नौकरियों के वादे किए जा रहे हैं, लेकिन बंद हो चुके कल-कारखानों की बात कोई भी पार्टी नहीं कर रही है। बिहार में सरकारी, निजी और पीएसयू सेक्टर की कई यूनिट्स बंद हो चुकी हैं। कृषि उत्पादों पर आधारित और दवाई बनाने वाली ये यूनिट्स औसतन एक हजार लोगों को नौकरी दे रही थीं। कुछ यूनिट्स अभी भी किसी तरह चल रही हैं, लेकिन मौजूदा हालात में 2-3 साल से ज्यादा चलने की उम्मीद नहीं है। इनमें से ज्यादातर या तो चीनी मिलें हैं या फिर पूर्वी चंपारण में बटन बनाने के छोटे कारखाने।

'हिन्दुस्तान टाइम्स' ने जब इन बंद कारखानों का जायजा लेने की कोशिश की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। घटिया ढांचागत सुविधाएं, स्थानीय निकायों से लेकर बिजली और उद्योग विभागों के अधिकारियों की बेरुखी और जबरन वसूली इन उद्योग-धंधों के बंद होने की प्रमुख वजहों के तौर पर सामने आईं। उत्तर बिहार में 15 चीनी मिलें थीं। इनसे निकाले जा चुके कर्मचारियों का कहना है कि प्रत्येक चीनी मिल में कम-से-कम हजार लोगों को प्रत्यक्ष नौकरी मिलती थी और 25 हजार किसानों की जरूरतें पूरी होती थीं।

सुगौली के एक किसान संजय कुमार पांडेय ने कहा, "इनमें से 11 मिलें 90 के दशक के मध्य में लालू और राबड़ी के राज में बाहुबलियों द्वारा रंगदारी वसूले जाने की वजह से बंद हो गईं। कुछ बिजली की नियमित सप्लाई नहीं मिलने की वजह से बंद करनी पड़ीं। लेकिन, इनको फिर से चालू करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। इनमें से दो सुगौली और चंपारण में लौरिया की मिलें भारत सरकार में तत्कालीन सचिव और बगहा के मौजूदा विधायक आर एस तिवारी के प्रयासों से शुरू हो पाईं।"

मुजफ्फरपुर की बरूराज विधानसभा क्षेत्र के निवासी और मोतीपुर चीनी मिल से छंटनी के शिकार हो चुके राधेश्याम शाह बताते हैं, "चीन मिल की नौकरी से मेरे परिवार का भरण-पोषण होता था, लेकिन दो बार अस्थायी रूप से बंद होने के बाद वर्ष 1996 में यह स्थायी रूप से बंद हो गई। इसके 600 स्थायी और 1200 अस्थायी कर्चमारी रोड पर आ गए। पिछले ढाई दशकों में 20 से ज्याद कर्मचारी भुखमरी के शिकार हो चुके हैं, लेकिन न तो राज्य सरकार ने और न ही केंद्र सरकार ने इस मिल को फिर से शुरू करने का प्रयास किया।''

बिहार में उद्योग धंधों के बंद होने की श्रृंखला में ताजा नाम रेल मंत्रालय के उपक्रम भारत वैगन की दो यूनिटों का है। बंद होने के समय इसके कर्मचारी संघ के अध्यक्ष रहे एस के वर्मा बताते हैं, "मुजफ्फरपुर और मोकामा स्थित इसकी दो यूनिटें मोदी सरकार के आदेश पर बंद हो गईं। अकेले मुजफ्फरपुर यूनिट में 1600 कर्मचारियों की रोजी-रोटी छिन गई।"

मेहसी में सीप से बटन बनाने के उद्योग का हाल भी बेहाल है। एक समय मेहसी में बटन बनाने का व्यवसाय करने वाले मोहम्मद मकबूल ने बताया, "लालू-राबड़ी राज से पहले हम प्रति महीने 10 से 50 हजार रुपये तक कमा लेते थे। इसके बाद अपराधियों ने रंगदारी मांग-मांगकर हमारे धंधे को बर्बाद कर दिया। छोटे उद्यमियों ने तो कामकाज को समेट लिया, लेकिन समर्थवान लोगों ने दूसरे राज्यों में अपना कामकाज शिफ्ट कर लिया।" इस इलाके में करीब 10 हजार लोग बटन बनाने का काम करते थे।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर बंद पड़े उद्योग-धंधों को फिर से शुरू कर लिया जाए तो बेरोजगारी की समस्या का समाधान खुद ब खुद निकल जाएगा। रिटायर्ड यूनिवर्सिटी टीचर कृष्ण मोहन प्रसाद बताते हैं, "युवाओं को जैसे ही रोजगार मिलने शुरू हो जाएंगे, अपराध दर में कमी आने लगेगी। लेकिन, चुनाव दर चुनाव वोटर्स को बेवकूफ बनाया जा रहा है लेकिन किसी भी सरकार ने बंद पड़ीं इन यूनिटों को खोलेने की हिम्मत नहीं दिखाई। बिजली, पीने का साफ पानी, शौचालय और घरों पर पक्की छत के लिए काम करने वाली नीतीश सरकार ने भी इस बारे में नहीं सोचा।"

आरजेडी की स्टेट यूनिट के प्रवक्ता और महासचिव मोहम्मद इकबाल शमी जोर देकर कहते हैं कि राजद के कार्यकाल में कुछ औदियोगिक इकाइयों को फिर से शुरू करने का प्रयास हुआ था। उन्होंने कहा, "मुझे पूरा भरोसा है कि तेजस्वी जब युवाओं को रोजगार देने की बात कर रहे हैं तो उनके दिमाग में यह मुद्दा है।''

मुजफ्फरपुर के स्थानीय विधायक और शहरी विकास मंत्री सुरेश कुमार शर्मा ने कहा, "भारत वैगन की यूनिटों को बंद करने का फैसला मनमोहन सरकार के कार्यकाल में ही हुआ था। मोदी सरकार ने इन्हें बचाने की कोशिश की लेकिन इन यूनिटों के भारी घाटे की वजह से ऐसा संभव नहीं हो पाया। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए हमने मधेपुरा में रेल इंजन बनाने का कारखाना शुरू किया है।"

उत्तर बिहार में कौन-सा प्रमुख कारखाना कब बंद हुआ?

1.इंडियन फार्मास्युटिकल प्राइवेट लिमिटेड 1991

2.बिहार वैगन की मुजफ्फरपुर और मोकामा यूनिट 2019

3.मोतीपुर चीनी मिल 1996

4.मोतिहारी चीनी मिल 1995

5.चनपटिया चीनी मिल 1995

6.मरहौरा चीनी मिल 1997

7.मॉर्टन टॉफी फैक्ट्री 2001

8. चकिया चीनी मिल 1999

9.बगहा पेपर मिल  1983 

10.सीप आधारित लघु उद्योग 1993-2005 

11.बेतिया में चमड़ा उद्योग 1981 

12.रक्सौल में स्पंज आयरन फैक्ट्री 2003

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