भीमा-कोरेगांव युद्ध: 500 महारों ने पेशवा के 28,000 सैनिकों को हराया,ये था इतिहास
पुणे के भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं सालगिरह को लेकर सोमवार को आयोजित समारोह हिंसा में तब्दील हो गया। दरअसल 1 जनवरी 1818 को भीमा-कोरेगांव में अंग्रेजों की सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की 28000...

पुणे के भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं सालगिरह को लेकर सोमवार को आयोजित समारोह हिंसा में तब्दील हो गया। दरअसल 1 जनवरी 1818 को भीमा-कोरेगांव में अंग्रेजों की सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की 28000 सैनिकों को हराया था। ब्रिटिश सेना में अधिकतर महार समुदाय के जवान थे और इसलिए दलित समुदाय इस युद्ध को ब्रह्माणवादी सत्ता के खिलाफ जंग मानता है।
इतिहासकारों के मुताबिक 5 नवंबर 1817 को खडकी और यरवदा की हार के बाद पेशवा बाजीराव द्वितीय ने परपे फाटा के नजदीक फुलगांव में डेरा डाला था। उनके साथ उनकी 28,000 की सेना थी, जिसमें अरब सहित कई जातियों के लोग थे। लेकिन महार समुदाय के सैनिक नहीं थे।
दिसंबर 1817 में पेशवा को सूचना मिली कि ब्रिटिश सेना शिरुर से पुणे पर हमला करने के लिए निकल चुकी है। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश सैनिकों को रोकने का फैसला किया। 800 सैनिकों की ब्रिटिश फौज भीमा नदी के किनारे कोरेगांव पहुंची। इनमें लगभग 500 महार समुदाय के सैनिक थे।
नदी की दूसरी ओर पेशवा की सेना का पड़ाव था। 1 जनवरी 1818 की सुबह पेशवा और ब्रिटिश सैनिकों के बीच युद्ध हुआ, जिसमें ब्रिटिश सेना को पेशवाओं पर जीत हासिल हुई। इस युद्ध की याद में अंग्रेजों ने 1851 में भीमा-कोरेगांव में एक स्मारक का निर्माण कराया। हार साल 1 जनवरी को इस दिन की याद में दलित समुदाय के लोग एकत्र होते थे।
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अंबेडकर ने शुरू की समारोह की परंपरा : 1 जनवरी 1927 को बाबा सहेब भीमराम अंबेडकर ने इस स्थान आयोजित कार्यकम में हिस्सा लिया। तब से इस स्थान पर इस दिन को मनाया जाता रहा है।
स्मारक पर एक पट्टिका को लेकर भी विवाद : ब्रिटिश काल में निर्मित इस स्मारक पर भारतीय सेना के पूना हॉर्स रेजिमेंट ने ‘एक सम्मान पटल’ लगवाया था। इसमें उन शहीदों के नाम थे, जो रेजिमेंट के सदस्य थे और जिन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ 1965 और 1971 की जंग लड़ी थी। इसको लेकर भी एक धड़े में असंतोष था।




