ट्रेंडिंग न्यूज़

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News देशबाल ठाकरे, विनोबा भावे और खुशवंत सिंह; किन हस्तियों ने किया था इंदिरा के आपातकाल का समर्थन

बाल ठाकरे, विनोबा भावे और खुशवंत सिंह; किन हस्तियों ने किया था इंदिरा के आपातकाल का समर्थन

इमरजेंसी की 50 बरसी पर देश की राजनीति में बवाल मचा हुआ है। संसद सत्र तक इसकी गूंज है। जानते हैं उन लोगों के बारे में जिन्होंने 1975 में इंदिरा सरकार द्वारा आपातकाल की घोषणा का समर्थन किया था।

बाल ठाकरे, विनोबा भावे और खुशवंत सिंह; किन हस्तियों ने किया था इंदिरा के आपातकाल का समर्थन
Jagriti Kumariलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीTue, 25 Jun 2024 04:37 PM
ऐप पर पढ़ें

जून 1975 में देश में तत्काल प्रभाव से इमरजेंसी की घोषणा कर दी गई। इंदिरा गांधी ने अपने रेडियो संबोधन में कहा, "राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा की है। घबराने की कोई जरूरत नहीं है।" इस घटना को भारत के लोकतंत्र में काला अध्याय भी कहा जाता है। आपातकाल लागू होने के बाद देश में किसी भी तरह के चुनाव पर रोक लग गए। इस दौरान लोगों को बिना वारंट गिरफ्तार किया जा सकता था। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दिया गया और बिना सरकारी मंजूरी के कुछ छापना तक आपको जेल पहुंचा सकता था। इस दौरान विपक्ष के नेता जेपी नारायण ने इसे भारतीय इतिहास का सबसे काला दौर कहा था। जेपी नारायण सहित अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस, चंद्रशेखर और यहां तक ​​कि तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के बेटे एमके स्टालिन को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। लेकिन, इंदिरा गांधी की कांग्रेस (ओ) के अलावा हर कोई सरकार का विरोध नहीं कर रहा था। कुछ बड़े समर्थक भी थे।

बाल ठाकरे

इस लिस्ट में सबसे पहले बाल ठाकरे नाम शामिल है। महाराष्ट्र के कद्दावर नेता और शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे कांग्रेस के कट्टर विरोधियों में से एक थे। लेकिन उन्होंने 1975 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल की घोषणा का खुलकर समर्थन करके कई लोगों को चौंका दिया था। शिवसेना ने इंदिरा गांधी की आपातकाल को बाल ठाकरे के समर्थन के लिए खेद प्रकट नहीं किया है। पिछले साल सामना में लिखते हुए पार्टी प्रवक्ता संजय राउत ने कहा, "अगर इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल की घोषणा के दिन को 'काला दिवस' कहा जाना है, तो मौजूदा केंद्र सरकार के तहत ऐसे कई 'काले दिन' थे। जिस दिन नोटबंदी की घोषणा की गई, उसे भी 'काला दिवस' कहा जाना चाहिए, क्योंकि इसने आर्थिक अराजकता पैदा की थी।" हालांकि, आपातकाल के समर्थन के कारण 1978 के महाराष्ट्र विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में शिवसेना को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। इससे पार्टी को इतना नुकसान हुआ कि बाल ठाकरे ने मुंबई के शिवाजी पार्क में एक रैली में इस्तीफे की पेशकश की। पार्टी में इसके खिलाफ़ हंगामा होने के बाद उन्होंने अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया। 

विनोबा भावे

स्वतंत्र भारत के बाद विनोबा भावे सबसे प्रसिद्ध गांधीवादी थे। कई लोग उन्हें महात्मा गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी मानते थे। उन्होंने अपने भूदान आंदोलन से ख्याति अर्जित की थी। गांधीवादी विनोबा ने इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल का समर्थन करके कई लोगों को चौंका दिया था। विनोबा भावे ने आपातकाल की घोषणा को अनुशासन का त्योहार कहा था। आपातकाल के उनके समर्थन के कारण आलोचकों ने उन्हें "सरकारी संत" का नाम दे दिया था।

जेआरडी टाटा

उद्योगपति जेआरडी टाटा, जो काफी हद तक अराजनीतिक रहने के लिए जाने जाते थे, आपातकाल के एक और हाई-प्रोफाइल समर्थक थे। न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में, टाटा ने आपातकाल लागू करने पर इंदिरा गांधी को अपने समर्थन को उचित ठहराया था। उन्होंने कहा कि "चीजें बहुत आगे बढ़ गई थीं। आप कल्पना नहीं कर  सकते कि हम यहां क्या-क्या झेल रहे हैं- हड़तालें, बहिष्कार, प्रदर्शन। ऐसे दिन क्यों आए जब मैं अपने कार्यालय से बाहर सड़क पर नहीं निकल पाया है।"

खुशवंत सिंह

प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक खुशवंत सिंह, आपातकाल लागू करने पर इंदिरा गांधी का समर्थन करने वाले कुछ संपादकों में से एक थे। उन्होंने जयप्रकाश नारायण के "संपूर्ण क्रांति" के आह्वान की आलोचना की थी और इसे अलोकतांत्रिक बताया था। 2000 में, खुशवंत सिंह ने एक लेख, "मैंने आपातकाल का समर्थन क्यों किया" में आपातकाल का समर्थन करने के अपने कारणों को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, "मैं मानता हूँ कि विरोध करने का अधिकार लोकतंत्र का अभिन्न अंग है। आप सरकारी कार्यों की आलोचना या निंदा करने के लिए सार्वजनिक बैठकें कर सकते हैं। आप जुलूस निकाल सकते हैं, हड़ताल और व्यापार बंद करने का आह्वान कर सकते हैं। लेकिन कोई जबरदस्ती या हिंसा नहीं होनी चाहिए। यदि कोई है, तो सरकार का कर्तव्य है कि यदि आवश्यक हो तो बलपूर्वक इसे दबा दे।"

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

सीपीआई देश की सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी है और आज़ादी के समय यह राष्ट्रीय राजनीति में एक मज़बूत विपक्षी दल थी। दरअसल, केरल में सीपीआई की सरकार पहली थी जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान के अनुच्छेद 356 का हवाला देकर बर्खास्त कर दिया था। हालांकि, इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए सीपीआई कांग्रेस की तरफ़ झुक गई थी। जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया, तो सीपीआई ने विपक्ष से नाता तोड़ लिया और इस कदम का समर्थन किया, जबकि सीपीआई (एम) - जो कि इससे अलग हुआ गुट था, ने आपातकाल का विरोध किया था। हालांकि, 1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की पार्टी की हार के बाद सीपीआई ने उनसे दूरी बना ली। 2015 में, सीपीआई ने आखिरकार स्वीकार किया कि आपातकाल का समर्थन करना एक राजनीतिक भूल थी। सीपीआई महासचिव एस सुधाकर रेड्डी ने कहा था कि पार्टी उस समय की राजनीतिक वास्तविकता को समझने में विफल रही। सीपीआई के वरिष्ठ नेता गुरुदास दासगुप्ता ने इसे "एक बड़ी राजनीतिक भूल" कहा।

Advertisement