कोहरा तालुकदार बाबू भूप सिंह ने जगाई थी स्वतंत्रता की अलख
अमेठी के बाबू भूप सिंह ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूका, युवाओं को देश सेवा के लिए प्रेरित किया और कई युद्धों में भाग लेकर देशवासियों में स्वतंत्रता का जुनून जगाया। उनका शौर्य और बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव बने।

अमेठी। जिले के कोहरा के तालुकेदार रहे बाबू भूप सिंह ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आजादी का बिगुल फूंक दिया था। उन्हें अंग्रेजों के विरुद्ध देशवासियों में एक नई चेतना जगाई और कई युद्धों में भाग लेकर अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिए। इतिहास के पन्नों पर बाबू भूप सिंह की शौर्य गाथा अमर हो गई है और युवाओं के लिए प्रेरणाश्रोत है। बाबू भूप सिंह की अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक व्यापक जन आंदोलन था, जिसने पूरे राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया था। उनके भाले ने न सिर्फ अंग्रेज़ों का डटकर सामना किया, बल्कि लाखों भारतीयों को संगठित होने की प्रेरणा भी दी।
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा किए जा रहे धार्मिक एवं सांस्कृतिक दमन और आर्थिक शोषण से चिंतित तालुकदार बाबू भूप सिंह की भेंट 1856 में कोहरा प्रवास पर आए राजगुरु रामदास जी से हुई। जिनसे हुई चर्चा के बाद बाबू भूप सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध एक सशक्त संघर्ष का संकल्प लिया। उन्होंने लखनऊ रेजीडेंसी की घेराबंदी में अपनी सेना के साथ कमान संभाली और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिससे घबराई हुई अंग्रेजी हुकूमत ने कर्नल राऊटन को सेना सहित रेजीडेंसी को मुक्त कराने के लिए लखनऊ भेजा। जिस पर अवध के सेनानियों ने यह निर्णय लिया कि रेजीडेंसी का घेराव कर रहे सुलतानपुर, प्रतापगढ़ व आसपास के तालुकदार, राजा अपनी सेना के साथ कूच करें और लखनऊ आ रही ब्रिटिश सेना को रोकें। इस निर्णय के उपरांत बाबू भूप सिंह कोहरा लौटे और चतुर्भुज मंदिर में एक बैठक कर क्षेत्रीय युवाओं से भी देश सेवा में जुड़ने का आह्वान किया। अंग्रेजी सेना को आगे बढ़ने से रोकने के लिए बाबू भूप सिंह ने चांदा, अमहट और कादूनाला में कई भीषण युद्धों में भाग लिया।अक्टूबर 1857 में बाबू भूप सिंह ने चांदा में अंग्रेज़ों के विरुद्ध रण का बिगुल फूंका। सीमित संसाधनों के बावजूद, उनकी सेना ने निर्भीकता से अंग्रेज़ों का मुकाबला किया। फरवरी 1858 में, उन्होंने एक बार फिर चांदा में अंग्रेज़ों को खदेड़ने का प्रयास किया। मार्च 1858 में अमेठी जिले के कादूनाला में एक भीषण युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध में बाबू भूप सिंह के भाले ने दर्जनों अंग्रेजी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इस युद्ध में हजारों वीर सपूतों ने अपनी जान न्योछावर कर दी। विद्रोह के बाद, कोहरा तालुकदारी पर अत्याचारों का पहाड़ टूट पड़ा। ब्रिटिश सरकार ने सेना की एक टुकड़ी कोहरा भेजी। जिसने लोगों पर बड़े जुल्म किए। परंतु बाबू भूप सिंह के द्वारा जगाई गई देशभक्ति की ज्वाला को बुझाना आसान नहीं था। बाबू भूप सिंह जैसे 1857 के क्रांतिकारियों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी। उनकी अटूट संकल्प शक्ति और देशभक्ति आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।


