Ayodhya unresolved dispute even after independence from Mughal Empire - अयोध्या: मुगल साम्राज्य से लेकर आजादी के बाद भी अनसुलझा रहा विवाद DA Image
13 नबम्बर, 2019|6:01|IST

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अयोध्या: मुगल साम्राज्य से लेकर आजादी के बाद भी अनसुलझा रहा विवाद

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अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद मुगल साम्राज्य, ब्रिटिश शासन और देश की आजादी के बाद भी दशकों तक अनसुलझा रहा था। लेकिन उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद यह विवाद समाप्त हो गया। 

उच्चतम न्यायालय ने शनिवार को कहा कि 1989 में भगवान श्रीराम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी। अयोध्या में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी पूजा-सेवा जारी रही। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने मुसलमान पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि राम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त है क्योंकि घटना 1949 की है और याचिका 1989 में दायर की गई है। अदालत ने अयोध्या में विवादित स्थल राम जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद के निर्माण के लिए पांच एकड़ भूमि आबंटित की जाए। 

130 साल पुराना विवाद : 
भारतीय इतिहास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस व्यवस्था के साथ ही करीब 130 साल से चले आ रहे इस संवेदनशील विवाद पर परदा गिर गया। मुगल बादशाह बाबर के कमांडर मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में कराया था। यह पाया गया कि यह स्थल दशकों से निरंतर संघर्ष का केंद्र रहा। 1856-57 में मस्जिद के आसपास के इलाकों में हिंदू और मुसलमानों के बीच कई बार सौहार्द बिगड़ा। 

 

दो भागों में विभाजित किया:
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि दो धार्मिक समुदायों के बीच कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने परिसर को भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित करते हुए छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की। भीतरी बरामदे का इस्तेमाल मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिंदू पूजा के लिए करने लगे। 

 

पहली याचिका 1950 में :
इस विवाद में पहला मुकदमा राम लला के भक्त गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी, 1950 को दायर किया था। इसमें उन्होंने विवादित स्थल पर हिन्दुओं के पूजा का अधिकार लागू करने का अनुरोध किया था। उसी साल पांच दिसंबर, 1950 को परमहंस रामचंद्र दास ने भी पूजा अर्चना जारी रखने और विवादित ढांचे के मध्य गुंबद के नीचे ही मूर्तियां रखी रहने के लिए मुकदमा दायर किया लेकिन 18 सितंबर, 1990 को मुकदमा वापस ले लिया था। 

 

निर्मोही अखाड़े ने 1959 में 2.77 एकड़ विवादित स्थल के प्रबंधन और शेबैती अधिकार के लिए निचली अदालत में वाद दायर किया। इसके दो साल बाद 18 दिसंबर 1961 को उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड भी अदालत में पहुंचा गया और उसने बाबरी मस्जिद की विवादित संपत्ति पर मालिकाना हक होने का दावा करते हुए इसे बोर्ड को सौंपने और वहां रखी मूर्तियां हटाने का अनुरोध किया। 
 

अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने की घटना के बाद सारे मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय को निर्णय के लिए सौंप दिए गए थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के फैसले में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों (सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला) के बीच बांटने के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी। 

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